Friday, 7 July 2017

दोहा

दोहा (13/11)
श्रृंगार रस

सोलह के दहलीज पर,यह कैसी झंकार।
नई नई दुनिया दिखे,नया नया श्रृंगार।।

होठों पर मादक हँसी,नयना झलके प्यार।
बातों से  मधुरस  झरे, अलबेली  है  नार।।

झुमका मानो कह रहे,कानो में रस घोल।
यौवन तुझपे आ गया,गोरी कुछ तो बोल।।

गला सुराही की तरह,काले लंबे बाल।
माथे पर चंदा लगे,बिन्दी मखमल लाल।।

दर्पण कंघी से हुआ,अनायास ही प्यार।
सजने-धजने है लगी,दिन मे सोलह बार।।

स्वप्न  सुनहरे  आ  गए, लेकर  के  बारात।
पिया-पिया मन कह उठा,नही चैन दिन-रात।।

नाच उठी पायल छनक,कँगना करती शोर।
प्रियतम मुझको ले चलो,प्रेम गर की ओर।।

हेमंत कुमार मानिकपुरी
भाटापारा
छत्तीसगढ़

Tuesday, 27 June 2017

पढ़व लिखव

पढ़व-लिखव (दोहा 13/11)

पढ़व लिखव लइका तुमन,इही तुहँर ले आस।
सब धन दौलत ले बने,सिक्छा हे जी खास।।

कलम काम के जी हवय,करव रोज अभ्यास।
देख ताक लव ककहरा,झटकुन होवव पास।।

गुणा इबारत  अउ  करव , भाग  घटाना  जोड़।
सीख सबोझन लव गणित,आलस पन ला छोड़।।

कूदत नाचत जी पढ़व, रस्ता रेंगत  जात।
खेल खेल मा सीखना,आय मँजा के बात।।

आस पास के लव तुमन,चलत फिरत संज्ञान।
खेत  खार  बारी  सबो , देखव गउ  गउठान।।

पढ़ना लिखना हे बने ,मन मा राखव ठान।
गुनव कढ़व सब झन बनव,देश राज के शान।।

आज्ञाकारी तुम  बनव,रखव  बड़े के मान।
पढ़ना तब होही सफल,सही कहँव मैं जान।।

हेमंत कुमार मानिकपुरी
भाटापारा
छत्तीसगढ़

Sunday, 25 June 2017

दोहा

गरज गरज बादर बने,पानी कस के ढार।

खेत खार छलके मुही,छलके तरिया पार।।

रूख-राइ जंगल कहे, दे  हम ला  उपहार।

हरियर हरियर हम दिखन,जिनगी हमर सवाँर।।

नान्हेंकन बीजा गड़े,करत हवय गोहार।।

धरती झटकुन भींज तैं,देखँव मँय संसार।।

मेचका धरती मा दबे,हे पानी के आस।

टरटों टरटों जी हमूँ,गा के करबो रास।।

मानुस तन थर्राय हे,पा के अब्बड़ घाम।

पानी के बिन हे परे,गाड़़ा भर के काम।।

नाँगर चलही खेत भर,पाबो कँस के धान।

जाँगर हमर सुफल करव,हे जलधर भगवान।।

हेमंत कुमार मानिकपुरी

भाटापारा छत्तीसगढ़

Tuesday, 13 June 2017

उमड़ घुमड़ करिया बादर,
पानी सरबर सरबर कर दे,
झुख्खा हे धरती के कोरा,
हे मेघ दूत तँय दया कर दे।

हे मेघ.....

उसनावत हे जम्मो परानी,
जग चिल्लावय पानी पानी,
अब दे फुहार नव जीवन बर,
झरर झरर बरसा कर दे।

हे मेघ......

जंगल के हरियाली बर,
चुरगुन के किलकारी बर,
बियाकुल चौपाया मन म,
शीतल नीर सरस भर दे।

हे मेघ.....

नँदिया तरिया खोचका डबरा,
गली खोर अमरइया नरवा,
जम्मो देखत हे आस लगाये,
सब ल पानी पानी कर दे।

हे मेघ....

बारी-बखरी ,खेती-किसानी,
सब ल चाही कस के पानी,
आँसू झिन किसान के बोहय,
अइसन तैं खुशहाली भर दे।

हे मेघ दूत तँय दया कर दे..

रचना
हेमंत मानिकपुरी
भाठापारा
छत्तीसगढ़

Wednesday, 31 May 2017

घूम लिए तीरथ सभी,मन आया ना चैन।
माँ की गोदी में तनय,कभी बिताओ रैन।।

काँटो पर चलती रही,दे तुमको कालीन।
बूढ़ी अम्मा की सदा,सेवा कर लो लीन।।

बाप बना घोड़ा कभी,जिस पर बैठे आप।
घोड़ा अब बूढ़़ा हुआ,आप बनो जी बाप।।

खून,पसीना कर तुझे,बड़ा किया है पाल।
ज्यादा मत थोड़ा सही,फर्ज चुकाओ लाल।।

तेरा  भी  बेटा  तुझे , छोड़  चलेंगे  मान।
अच्छा बोओगे तभी,सुफल मिले है जान।।

हेमंत कुमार
भाटापारा

Saturday, 27 May 2017


दोहे.....१३/११

दाई के अँगना छुटे,ददा बबा के प्यार।

काट बछर सोला डरे,जा मैना ससुरार।।

टोरे ले टूटय नही,लेख लिखे जे हाथ।

बेटी तँय पहुना रहे,बस अतके हे साथ।।

धर ले मइके के मया,इही तोर पहिचान।

सास ननँद देवर ससुर,सबके करबे मान।।

ददा  नवा  दाई  नवा , नवा  ठउर  हे  तोर।

अपन जान तँय राखबे,सबके मन ला जोर।।

अपन सजन के सँग सरग,अँगना घर संसार।

सपना मा झन सोंचबे, अहित कभू ससुरार।।

दोहे....

हेमंत कुमार

भाटापारा

Wednesday, 3 May 2017

दोहे.....

गरमी बाहर है बहुत,बिगड़ गया है रूप।

घर की खिड़की से सुबह,कहने आई धूप।।

धू-धू कर जलती धरा,मिले नही अब ठाँव।

है इतनी गरमी बढ़ी , सूरज  खोजे  छाँव।। 

 

धरती  फटने है  लगी,बरस रहा है  आग।

सड़कें चट चट जल रहीं,सूख गये सब बाग।।

 
 
इंद्र देव करने लगे,त्राहिमाम का जाप।

नदी ताल सब उड़ गये,बनकर जैसे भाप।।

तेज-तेज लू भी चले,खेत खार खलिहान।

जीव जन्तु सब हो रहे,गरमी से हलकान।।

हेमंत कुमार मानिकपुरी

भाटापारा  छत्तीसगढ़

Sunday, 30 April 2017

मात्रा ---13/11(दोहा)
पंखे  से  चलती  हवा,  गमले  पर है पेड़।
घाँस उगे छत के उपर,चरे जिसे सब भेड़।।

चौपाया बुक मे मिले, जंगल  टी वी  देख।
फिश घर मे पलने लगे,सही कहूँ मै लेख।।

बीबी सब कुछ जब लगे,कोई कैसे भाय।
बाप मरा  माता मरी, आँसू  कैसे  आय।।

दारू पी कर आ रहे,बोतल बोतल रोज।
घर पर इक दाना नही,बच्चे तरसे भोज।।

जब भी वो कूँ कूँ करे,मन भर आया प्यार।
माँ बिन चप्पल  के  चले, कुत्ता  बैठे  कार।।

काम धाम कुछ भी नही,हर दिन खेले ताश।
यही करम तो कर रहा,कई जनों  का  नाश।।

-–-रचना
हेमंत मानिकपुरी
भाटापारा छत्तीसगढ.

Thursday, 27 April 2017

1222/1222/122

ये सच कहने की हिम्मत है?नही तो,
कोई दिल  में  बगावत है? नही तो।

सदा-ए-दिल ही चाहत है?नही तो
मुहब्बत इक जियारत है?नही तो,

अकेला घर, अकेले कैद हो तुम
बुढ़ापे की ये कीमत है?नही तो

मेरी आँखें है गहरा इक समन्दर
तुम्हे लहरों की आदत है?नही तो

बहुत खामोश है वो कुछ दिनों से
किसी से कुछ शिकायत है? नहीं तो

हैं जिंदा लाशें हम सब इस जहाँ में,
ये सच सुनने की जुरअत है?नही तो

मै अपने घर मे इक घर ढूँढता हूँ,
यही क्या मेरी नक्बत है ?नही तो

ग़ज़ल
हेमंत कुमार मानिकपुरी
भाटापारा छत्तीसगढ़

Wednesday, 26 April 2017

बस्तर रोता है सिसक,रोज देख अब लाश।

खून खराबे से हुआ,अमन चैन का नाश।।

कोयल की वाणी लगे,दुखियारी के बोल।

ममता की छाती फटी, मौत बजाती ढोल।।

महुआ की रौनक गई, झड़ा आम से बौर।

पत्ते सहमे से लगे,हवा बही कुछ और।।

बम के फल लगते जहाँ,पेड़-पेड़ पर आज।

धरती फटती सी लगे ,तड़के जैसे गाज।।

नेता सब झूठे लगे,करते सत्ता भोग।

पल पल मरते हैं यहाँ,भोले भाले लोग।।

डरा डरा करते रहे,सत्ता सुख के काज।

माओवादी ये बता,क्यूँ यह रावण राज।।

कुर्बानी कब तक चले,कब तक ममता रोय।

मारो चुन चुन के सभी,हत्यारा जो होय।।

दोहे

हेमंत कुमार मानिकपुरी

भाटापारा

Friday, 21 April 2017

दूर क्षितिज पर बजते ढोल,

अनहद बाजे जहाँ अनमोल,

आनंद की वर्षा होती जहाँ,

दिन नही न रात घनघोर।

दूर क्षितिज पर....

श्वेत धवल प्रकाश चाँदनी,

विचारों की शून्य आवृत्ती,

सुख जहाँ स्वार्थ से परे,

सत्ता नही न कोई गठजोड़।

दूर क्षितिज ....

ओम् के स्वर की साधना है,

तंद्रा नही वहाँ आराधना है,

जहाँ कुंडलिनी की जागरण है,

भोग नही जहाँ हैं योगी के बोल।

दूर क्षितिज पर.....।

न वासना न कोई व्यभिचार,

समाधी है सिद्ध हस्थों की,

संभोग की अनंत अनुभूती है,

जहाँ शरीर उर्ध्वगामी अनमोल।

दूर क्षितिज पर बजते ढोल।

रचना

हेमंत कुमार

भाटापारा

17/5/2015

Thursday, 20 April 2017

ग़ज़ल

2122, 212, 2122, 212

उससे मुझको सच मे कोई शिकायत भी नही,
हाँ मगर दिल से मिलूँ अब ये चाहत भी नही।

इस बुरुत पर ताव देने का मतलब क्या हुआ,
गर बचाई जा सके खुद की इज्जत भी नही।

अब अँधेरा है तो इसका गिला भी क्या करें,
ठीक तो अब रौशनी की तबीअत भी नही।

आती हैं आकर चली जाती हैं यूँ ही मगर,
इन घटाओं मे कोई अब इक़ामत भी नही।

जुल्म सहने का हुआ ये भी इक अन्जाम है,
अब नजर आखों में आती बगावत भी नहीं ।

बुरुत-मूँछ
इक़ामत-ठहराव

ग़ज़ल

हेमंत कुमार

भाटापारा छत्तीसगढ़

8871805078

Ok------

Friday, 24 February 2017

१२१२/११२२/१२१२/११२१

काफिया -आर  रदीफ -की बात

नहीं है अच्छा हरिक रोज हमसे खार की बात,
कभी तो प्यार से कर लेते हमसे प्यार की बात।

वो जख्मों को जो  हरा करते हैं बता दो उन्हें भी,
किया नहीं वो कभी करते है  बहार की बात।

जरा उठा दे कोई परदा इन बे कदरो के सर से,
जो दंगा करते है फिर करते है वो ज़ार की बात।

उड़ाया कर मेरी बातों का भी मजाक मगर तू,
ना इतना करना कभी तू मगर गुसार की बात।

दिलों में आग लगाते देखी है दुनिया हेमंत,
जो उजले है वो ही करते है जाना ख़्वार की बात।

ग़ज़ल
हेमंत कुमार
भाटापारा छत्तीसगढ़

खार-कांटा
गुसार -दूर होना
ज़ार-पछतावा
ख़्वार-दुष्ट

Tuesday, 21 February 2017

2122/1212/22

जब भी सज़्दा कभी अदा होगा,

हर वो पत्थर सही खुदा होगा।

सुब्ह से आंखो मे नमी सी है,

कोई बारिश कँही हुआ होगा।

हर सज़ा को सज़ा नही कहते,

प्यार मे कैदी भी हँसा होगा।

तेरा मेरा मिलन हुआ जब भी,

चाँद सूरज कँही मिला होगा।

पास आकर गले से लग जाओ,

तुम मिटा दो जो भी गिला होगा।

शह्र मे कोई आग देखा है,

दिल किसी का कँही जला होगा।

ग़ज़ल

हेमंत कुमार मानिकपुरी

भाटापारा  छत्तीसगढ़

















Monday, 20 February 2017

222222222222222(बहरे मीर)

अब जा के समझा हूँ गम का इक तहखाना होता है,

जो खा जाए ठोकर घर उनका मयखाना होता है।

जिनपे जो गुजरी है वो ही जाने गम क्या होता है,

जैसे तैसे घर पहुँचा वरना मयखाना होता है।

पी कर जीने वाले पी कर मरने वाले लाखों हैं,

अपनी अपनी किस्मत मे अपना मयखाना होता है।

शीशे के प्यालों मे दिल को छोड़ा है देखें क्या है,

टूटा तो मयखाना गर छलका मयखाना होता है।

जलता है तो जलने दो होगा कोई उसका सूरज,

पिघला जब मेरा कतरा कतरा मयखाना होता है।

ग़ज़ल

हेमंत कुमार मानिकपुरी

भाटापारा छत्तीसगढ़

8871805078

Sunday, 19 February 2017

2212/2212/2212

सूखे गुलाबों को जलाया क्यूँ नही,

टूटे हुए रिश्ते मिटाया क्यूँ नही।

गर थी मुहब्बत तुम्हे हमसे तो बता,

नज़रें मिलाके सर झुकाया क्यूँ नही।

बातों में जब हर जिक्र मेरा होता था,

उसने मुझे कुछ भी बताया क्यूँ नही।

आते रहे छत पे बहाने चाँद के,

आलम ये था तो मुस्कुराया क्यूँ नही।

जब था तसव्वुर मे हरिक आरा मेरा,

हाथों मे अपने फिर सजाया क्यूँ नही।

ग़ज़ल

हेमंत कुमार मानिकपुरी

भाटापारा।  छत्तीसगढ़


Saturday, 18 February 2017

२१२२/२१२२/२१२२

राख शोलों का लपट गर माँगता है,

फिर तबाही का वो मन्जर माँगता है।

मै पिला देता उसे पानी मगर वह,

खून का पूरा समन्दर माँगता है।

उम्र भर जिसको नचाया ही गया था,

रूह वो अब भी कलन्दर माँगता है।

खेल है अब जिन्दगी से खेलना भी,

अब जिसे देखो वो खन्ज़र माँगता है।

जो नुमाईंदे बने थे आबरू के,

वो हवस का गंदा बिस्तर माँगता है।

ग़ज़ल

हेमंत कुमार मानिपुरी

भाटापारा छत्तीसगढ.

8871805078







Wednesday, 15 February 2017

122/122/122/122

हरिक सख्स तेरा दिवाना है साकी,

ये दुनिया तो पीना पिलाना है साकी।

नशे मे रहा हूँ मै हरदम ये सच है,

तुझे पी लूँ तो होश आना है साकी।

यूँ ही लोग बदनाम करते हैं तुझको,

खुशी का तू सच मे ख़जाना है साकी।

ये दुनिया मुझे समझ ता है जो समझे,

यहीं पर मेरा बस ठिकाना है साकी।

वो जो गालियाँ दे रहा था तुझे कल,

वो भी आज तेरा दिवाना है साकी।

ग़ज़ल

हेमंत कुमार मानिकपुरी

भाटापारा

छत्तीसगढ़

Monday, 23 January 2017

२२१२/२२१२/२२१२

मै तो हवा हूँ मेरा कोई घर नही,

मेरी रवानी है मेरा कोई घर नही।

उड़कर चलूँ मै आसमाँ ये चाह है,

पर बेटी हूँ मेरा तो कोई पर नही।

तूफाँनो से वो खूब खेला करती है,

क्या ताक पे रख्खे दिया को डर नही?

मेरे हवाले भी करो कोई सहर,

इन आँखो को अंधेरे की आदत नही।

मुझमे ही खोता जा रहा हूँ वक्त-दर,

अब निकलने का हौसला बाहर नही।

देखो ये सूरज चढ़ गया है ताक पर,

है पास कोई भी अभी बरगद नही।

ग़ज़ल

हेमंत कुमार मानिकपुरी

भाटापारा छत्तीसगढ़

















Saturday, 21 January 2017

212/212/212/212

भीड़ मे मै अकेला ही चलता रहा,

हम सफर मेरा कोई ना साया रहा।

मेरे अपने कभी साथ थे ही नही,

उम्र भर अपने घर मे तन्हा रहा।

जा के देखा है बाजार मे मैने भी,

पैसों के आगे ईमान बिकता रहा।

साथ देने का वादा किया उसने था,

और वो दुश्मनी ही निभाता रहा।

कैसी ये उलझनो का बुरा दौर था,

पानी थी सामने और प्यासा रहा।

ग़ज़ल
हेमंत कुमार मानिकपुरी
भाटापारा



Friday, 20 January 2017

122/122/122/122

मै खुद से बहुत दूर रहने लगा हूँ,
मै हर रोज सूरज सा ढलने लगा हूँ।

कभी था बसेरा मेरा भी गुलों मे,
मै पतझड़ के पत्तों सा झड़ने लगा हूँ।

दिवारें बना दी गई मेरे घर मे,
मै कैदी के जैसा ही रहने लगा हूँ।

ये मेरा शहर था नही लगता है अब,
मै फिर गाँव का सख्स लगने लगा हूँ।

सफर खत्म होने लगा है मेरा हर,
मै सागर के लहरों मे मिलने लगा हूँ।

ग़ज़ल

हेमन्त कुमार मानिकपुरी

भाटापारा








Wednesday, 18 January 2017

खलिहानो के रूप अनुपम,
नव वधु सा खिला है चितवन,
मेढ़ों पर डाल पवन संग झूमें,
खग गुंजन से भरा है उपवन।

झांकती अंबर से सूर्य किरणें,
रक्ताभ ऊन के गोलों सा दिखता,
देख रहा तरूणवर के ह्रिदय तल से,
अपना झिलमिल सुन्दर चितवन।

धरती ठंड से कांप रही है,
ओस के बूंदो से पत्ते हैं चरमर,
कानन मानो धू धू जल उठा है,
धुआं धुआं है अम्बर का तल।

श्वेत वस्त्र सा दिख रहा है ,
पर्वतों पर हिम का वृहद फैलाव,
झर झर गिरते झरने दिखते,
झुमर हो जैसे वृहद भाल पर।

इठलाती बलखती बेलें तरू पर,
बालों के लट सा अनुपम बिखरा है,
कोमल हरित तृण मखमल हो जैसा,
सज रही धरा बन यौवना चंचल।

रचना
हेमंत कुमार मानिकपुरी
भाटापारा
8871805078










Sunday, 15 January 2017

2212/2212/2212

अक्सर मै फूलों को बचाया करता हूँ,

कांटो से मै खुद को सजाया करता हूँ।

इन मन्दिरों मे मस्जिदों मे जाना क्या,

कुछ भूखे बच्चों को खिलाया करता हूँ।

हँस्ता बहुत हूँ पर तुने जाना नही,

मै रात भर छुप छुप के रोया करता हूँ।

आना शहर मुझसे कभी मिलने जरा,

मै सब को आईना दिखाया करता हूँ।

मै प्यार मे जीता करूं ! चाहत नही,

मै प्यार मे सब हार जाया करता हूँ।

गजल
हेमंत कुमार मानिकपुरी
भाटापारा













Friday, 13 January 2017

२१२/२१२/२१२/२१२

गैरों की बात मुझको तो करना नही,

जब ये साया मेरा होता अपना नही।

पांव तो हैं बेशक इस जमी पे मगर,

जिंदगी भर यहां तो है रूकना नही।

रोक लेता मगर जानता था उसे,

वक्त भी तो कभी साथ ठहरा नही।

मेरी दादी कहा करती थी बात जो,

ठोकरें खा के भी मैने समझा नही।

भूल जाना कभी था ये घर अब कहाँ,

ये महज मिट्टी हैं जो गिराया नही।

बस ये आखिर मे दो गज जगह है मेरा,

और अब कोई भी तो ठिकाना नही।

ग़ज़ल
हेमंत कुमार मानिकपुरी
भाटापारा
छत्तीसगढ़

ददा के दुलार  पातेंव,
दाई के दुलार  पातेंव,
बेटी  अंव त का भईगे,
मया के संसार पातेंव।

मोरो तो मन होथे,
चुरगुन बन उड़ जातेंव,
पिंजरा झन होतिस कोनो,
खुल्ला में अगास पातेंव  ।


मोरो हवय सपना,
पढतेंव इस्कूल कालेज,
बेटा असन महूं ददा,
जघा जघा नाव कमातेंव।

झन करहू जल्दी बिहाव,
पहिली मोला सिरजाव,
देखन दव दुनिया दारी,
जियें के मे रद्दा पातेंव।

आवन दव मोला तुमन,
झन मारव कोंख म जी,
बेटी बेटा एके खून,
दुनो म झन अंतर पातेंव।

ताना झन कोनी कसतिस,
मोर विधवा के मान होतिस,
संग समाज के रसदा म,
हांथ आघू आघू महूं लमातेंव ।

सुघ्घर जिनगी होतिस,
सास ससुर देवर होतिस,
जरतिस झन जिंहा बहू,
अईसे मय ससुरार पातेंव।

रचना
हेमंत कुमार मानिकपुरी
भाटापारा

Wednesday, 11 January 2017

१२२/१२२/१२२/१२२

दिवाना अभी कोई घायल दिखा है,
मुहब्बत मे फिर कोई पागल दिखा है।

मुझे रहने दो इन किनारों पे आकर,
बड़ी मुद्दतों बाद साहिल दिखा है।

तमाशा है तेरा या कोई सजा है,
मरी फस्लें तब जाके बादल दिखा है।

मै अपनी हरम रख दिया हूं वहां पर,
जहां सांपों से लिपटा संदल दिखा है।

शहर की हवा मतलबी हो गई है,
हरिक सम्त मे कोई गाफ़िल दिखा है।

ग़ज़ल
हेमंत कुमार मानिकपुरी
भाटापारा