Tuesday, 29 September 2015

गज़ल

आज़र्दाह हुआ है दिल आदमियत के बगैर,
उजड़ा हुआ है चमन आदमियत के बगैर।

आश़ियां जाके हम किस किस शहर मे बसायें,
धुंआ धुंआ हर शहर हुआ है रौशनी के बगैर।

आशुफ़्ता-ए -आस करें आसरा किस किस पर,
दिल गुमराह है इक़्तजा-ए-इख्लास के बगैर।

इब्तिला-ए-इबादत मे इबारत-ए-इमान न रही,
एक कदम भी चला जाता नही अब खुदा तेरे बगैर।

"हेमंत" किस तरह जी लेते हो तुम बनके तब्बसुम,
मुर्दे ही तो बने हैं यहां लोग इंसानियत के बगैर।

रचना
हेमंतकुमार मानिकपुरी
भाटापारा
जिला बलौदाबाजार-भाटापारा
छत्तीसगढ़

गज़ल

जरा जरा सी बात थी पर और रूठा न कीजिए,
मोहब्बत की तारिख भी जरा गौर से पढ़ा कीजिए।

हम तो इशारे पर पर दांव लगाते है जिंदगी के लिए,
कागज पे जो लफ्ज है लिखा गौर से पढ़ा किजिये।

वो लकीर आपने ही बनाया था हमारे हाथों पर,
कभी फुर्सत हो तो थकदीरों को पढ़ लिया कीजिए।

तुमने तो जैसे कसम खा ली है हमसे दुरियाँ बनाने की,
अल्फाजों से ही सही जरा हमसे मिला तो किजिये।

हर गली चौराहे जब हम मिला करते थे "हेमंत"
सकूं-ए-यार के खातिर तिरछि निगाहों से देख तो लिया किजिये।

रचना
हेमंतकुमार मानिकपुरी
भाटापारा
जिला
बलौदाबाजार-भाटापारा
छत्तीसगढ़

गज़ल

मेंहदी के रंग बनकर कोई आया है हाथों मे,
कांच की चुड़ीयो सा कोई सजाया है हाथों मे।

मचल जाती है तमन्नाएं रह रहकर दिल की,
हमे कोई मुक्द्दर सा आजमाया है अपने हाथों मे ।

ये रूसवाईयां ये तनहाईयाँ अब दुर हो रही है,
ये मोहब्बत एक अजीब सा रंग लाया है हाथों में।

फूलों  सा महकता है दिल का हर कोना कोना,
ताजे गुलाब की छुअन हो जैसे कोई हाथो में।

ये बहारे यूं ही बरसती रहे वफा बनकर "हेमंत"
जैसे कोई पल चांद बनकर समाया हो हाथों में।

रचना
हेमंतकुमार मानिकपुरी
भाटापाराByt
जिला
बलौदाबाजार-भाटापारा
छत्तीसगढ़

परदेशीया के कथा (छत्तीसगढ़ी)

सीधा सादा मनखे मन ल तै बने लपेटा डारे,
गरीब मनखे ल परदेशीया तै हर मोह डारे।
जागत हे छतीसगढ़ीया सुन लव परदेशीया हो,
अब तुमन दिखिहव छत्तीसगढ़ ले मोटरा डारे॥

धोती सल्लूखा  लूगरी के तुमन मंजाक उड़ाये हवव,
सूट बूट पहिरे तुमन छत्तीसगढ़ ल कबजियाय हवव।
मसमोटी करव छत्तीसगढ़िया के रूपिया म तुमन,
घुरवा कचरा म जाहू अब तुमन  जैसे झुठन डारे॥

छत्तीसगढ़ के माटी म उपजे लयैका मन जाग गे हे,
तुमन अब नई राख सकव छत्तीसगढ़ ल भरमाये।
तुमन धोखा खाहू छत्तीसगढ़ के गूदा गूदा खवयीया हो ,
देखबो तुमन ल एक दिन छत्तीसगढ़ म मुड़ी माथा डारे॥

मोर महल हे मोर अटारी मोर सत्ता के सब पुजारी,
भागे बतर नई मिलही जब परही छत्तीसगढ़िया के लाठी।
छत्तीसगढ़ मोर महतारी ल अईसनहे जान देवन नही,
जियादा झिन कुलकुलाव इंहा ले जाहू  अब निंगधा डारे ॥

रचना
हेमंतकुमार मानिकपुरी
भाटापारा
जिला
बलौदाबाजार-भाटापारा
छत्तीसगढ़



गज़ल

तुम्हें देखे बिन सनम अब रहा भी नही जाता,
सामने आ जाओ तो कुछ  किया  भी नही जाता।

अजब ये कश्मकश है क्या उल्फत का दौर है,
चुप नही रहा जाता इकरार किया भी  नही जाता।

चैन नही रातो मे अब नींद भी करवटें बदलती है,
तकीयों के सहारे अब  रातें बसर किया भी  नही जाता।

इंतजार की घड़ीयां खत्म नही होती इशारों इशारों में,
इजहार वो नही करते इकरार मुझसे भी किया नही जाता।

अब ये इशक किस राह तक ले आया है तुझे "हेमंत"
निगाहों से इश्क की बातें सुलझाया भी किया नही जाता।

रचना
हेमंतकुमार मानिकपुरी
भाटापारा
जिला
बलौदाबाजार-भाटापारा
छत्तीसगढ़

गज़ल

वो पल भी जीया था ये पल भी जी लेता हूं,
कुछ हसीन यादों को अब भी गुनगुना लेता हूं।

दिन गुज़रा है तो छूटते गये बहोत से लमहें,
शराब अब भी टूटे हुए पैमाने पर छलका लेता हूं।

कुछ खास है वो घरौंदा जो हमने मिलके बनाया था,
अभी भी रेत मे जाकर मेरा दिल  बहला लेता हूं।

जरा सी बात पर रूठना समझ नही आया अब तलक,
इसी बहाने से मै कुछ अपना दिल भी जला लेता हूं।

नफरतों का दौर था "हेमंत" या तकदीर का भुलावा,
मिले थे पल भर के लिए उस पल को पल पल सजा लेता हूं।

रचना
हेमंतकुमार मानिकपुरी
भाटापारा
जिला
बलौदाबाजार-भाटापारा
छत्तीसगढ़

सुन लव रे दरूहा हो

सुनलव रे दरूहा हो मरे के बेरा बड़ पछताहू,
डिस्पोजल अऊ पानी के गेलास कहां कोनमेर पाहू।
कोनो मेर तुमन होवय जमा लेथव मदिरा डेरा,
इंहा ले उजरहू त तिरिया चरित्तर कस हांथ लमाये जाहू॥

कूद कूद के पीयत हव त कूद कूद के झगरा हे,
बाई रिसाय घर म कांव कां के कतेत डेरा हे।
तभो ले तुंहर दारू नई छुटत हे अक्खड़ दरूहा हो,
तुमन जग ल बिगाड़ के ये संसार म कहां सुख पाहू॥

दाई ददा भाई बहिनी बेटा बेटी कतका हलकान हे,
तभो ले दारू के चुलुक बर तोर कतका गुनगान हे।
बाई घर घर झाड़ू पोंछा लगाय बर जाथे लाज नई हे निशरमी,
इंहा तप ले रे भड़वा उंहा चांऊर बेच नई दारू पाहू॥

लड़भड़ लड़भड़ एती तेती जाय के गोठ आनी बानी हे,
कोन नाली अउ घुरूवा कचरा तुंहर बर अमृत पानी हे।
अब सुधर जव मोर भाई कस तुंहर जिनगानी हे,
दुनिया भर के गारि खा के ग भाई बड़ अबजस भर  पाहू॥

रचना
हेमंतकुमार मानिकपुरी
भाटापारा
जिला
बलौदाबाजार-भाटापारा
छत्तीसगढ़

Wednesday, 9 September 2015

जब भी प्यार को तराशा मैनै

जब भी प्यार को तराशा मैने बेवफा निकली,
अंधेरे मे कुछ और उज़ाला मे कुछ और निकली।

वक्त के साथ प्यार की आदतें भी बदलती रही,
जो कभी जां लुटाते रहे वो बन दिल से खंजर निकली।

दिल लगाया तो हमने कभी दिल्लगी कंहा कि थी,
समझा प्यार की मुरत जिसे वो पत्थर दिल निकली।

अब लगता है आशिकी तास के पत्तो जैसे खेल है,
इक्का भी हमारा तुरूप का फिर जाने क्यों बेगम निकली।

दिल लगाने का जी नही करता कहीं दुनिया  मे "हेमंत"
जिसको गले से लगाया वही गले का फंदा निकली।

रचना
हेमंतकुमार मानिकपुरी
भाटापारा
जिला
बलौदाबाजार-भाटापारा
छत्तीसगढ़