Sunday, 25 June 2017

दोहा

गरज गरज बादर बने,पानी कस के ढार।

खेत खार छलके मुही,छलके तरिया पार।।

रूख-राइ जंगल कहे, दे  हम ला  उपहार।

हरियर हरियर हम दिखन,जिनगी हमर सवाँर।।

नान्हेंकन बीजा गड़े,करत हवय गोहार।।

धरती झटकुन भींज तैं,देखँव मँय संसार।।

मेचका धरती मा दबे,हे पानी के आस।

टरटों टरटों जी हमूँ,गा के करबो रास।।

मानुस तन थर्राय हे,पा के अब्बड़ घाम।

पानी के बिन हे परे,गाड़़ा भर के काम।।

नाँगर चलही खेत भर,पाबो कँस के धान।

जाँगर हमर सुफल करव,हे जलधर भगवान।।

हेमंत कुमार मानिकपुरी

भाटापारा छत्तीसगढ़

Tuesday, 13 June 2017

उमड़ घुमड़ करिया बादर,
पानी सरबर सरबर कर दे,
झुख्खा हे धरती के कोरा,
हे मेघ दूत तँय दया कर दे।

हे मेघ.....

उसनावत हे जम्मो परानी,
जग चिल्लावय पानी पानी,
अब दे फुहार नव जीवन बर,
झरर झरर बरसा कर दे।

हे मेघ......

जंगल के हरियाली बर,
चुरगुन के किलकारी बर,
बियाकुल चौपाया मन म,
शीतल नीर सरस भर दे।

हे मेघ.....

नँदिया तरिया खोचका डबरा,
गली खोर अमरइया नरवा,
जम्मो देखत हे आस लगाये,
सब ल पानी पानी कर दे।

हे मेघ....

बारी-बखरी ,खेती-किसानी,
सब ल चाही कस के पानी,
आँसू झिन किसान के बोहय,
अइसन तैं खुशहाली भर दे।

हे मेघ दूत तँय दया कर दे..

रचना
हेमंत मानिकपुरी
भाठापारा
छत्तीसगढ़

Wednesday, 31 May 2017

घूम लिए तीरथ सभी,मन आया ना चैन।
माँ की गोदी में तनय,कभी बिताओ रैन।।

काँटो पर चलती रही,दे तुमको कालीन।
बूढ़ी अम्मा की सदा,सेवा कर लो लीन।।

बाप बना घोड़ा कभी,जिस पर बैठे आप।
घोड़ा अब बूढ़़ा हुआ,आप बनो जी बाप।।

खून,पसीना कर तुझे,बड़ा किया है पाल।
ज्यादा मत थोड़ा सही,फर्ज चुकाओ लाल।।

तेरा  भी  बेटा  तुझे , छोड़  चलेंगे  मान।
अच्छा बोओगे तभी,सुफल मिले है जान।।

हेमंत कुमार
भाटापारा

Saturday, 27 May 2017


दोहे.....१३/११

दाई के अँगना छुटे,ददा बबा के प्यार।

काट बछर सोला डरे,जा मैना ससुरार।।

टोरे ले टूटय नही,लेख लिखे जे हाथ।

बेटी तँय पहुना रहे,बस अतके हे साथ।।

धर ले मइके के मया,इही तोर पहिचान।

सास ननँद देवर ससुर,सबके करबे मान।।

ददा  नवा  दाई  नवा , नवा  ठउर  हे  तोर।

अपन जान तँय राखबे,सबके मन ला जोर।।

अपन सजन के सँग सरग,अँगना घर संसार।

सपना मा झन सोंचबे, अहित कभू ससुरार।।

दोहे....

हेमंत कुमार

भाटापारा

Wednesday, 3 May 2017

दोहे.....

गरमी बाहर है बहुत,बिगड़ गया है रूप।

घर की खिड़की से सुबह,कहने आई धूप।।

धू-धू कर जलती धरा,मिले नही अब ठाँव।

है इतनी गरमी बढ़ी , सूरज  खोजे  छाँव।। 

 

धरती  फटने है  लगी,बरस रहा है  आग।

सड़कें चट चट जल रहीं,सूख गये सब बाग।।

 
 
इंद्र देव करने लगे,त्राहिमाम का जाप।

नदी ताल सब उड़ गये,बनकर जैसे भाप।।

तेज-तेज लू भी चले,खेत खार खलिहान।

जीव जन्तु सब हो रहे,गरमी से हलकान।।

हेमंत कुमार मानिकपुरी

भाटापारा  छत्तीसगढ़

Sunday, 30 April 2017

मात्रा ---13/11(दोहा)
पंखे  से  चलती  हवा,  गमले  पर है पेड़।
घाँस उगे छत के उपर,चरे जिसे सब भेड़।।

चौपाया बुक मे मिले, जंगल  टी वी  देख।
फिश घर मे पलने लगे,सही कहूँ मै लेख।।

बीबी सब कुछ जब लगे,कोई कैसे भाय।
बाप मरा  माता मरी, आँसू  कैसे  आय।।

दारू पी कर आ रहे,बोतल बोतल रोज।
घर पर इक दाना नही,बच्चे तरसे भोज।।

जब भी वो कूँ कूँ करे,मन भर आया प्यार।
माँ बिन चप्पल  के  चले, कुत्ता  बैठे  कार।।

काम धाम कुछ भी नही,हर दिन खेले ताश।
यही करम तो कर रहा,कई जनों  का  नाश।।

-–-रचना
हेमंत मानिकपुरी
भाटापारा छत्तीसगढ.

Thursday, 27 April 2017

1222/1222/122

ये सच कहने की हिम्मत है?नही तो,
कोई दिल  में  बगावत है? नही तो।

सदा-ए-दिल ही चाहत है?नही तो
मुहब्बत इक जियारत है?नही तो,

अकेला घर, अकेले कैद हो तुम
बुढ़ापे की ये कीमत है?नही तो

मेरी आँखें है गहरा इक समन्दर
तुम्हे लहरों की आदत है?नही तो

बहुत खामोश है वो कुछ दिनों से
किसी से कुछ शिकायत है? नहीं तो

हैं जिंदा लाशें हम सब इस जहाँ में,
ये सच सुनने की जुरअत है?नही तो

मै अपने घर मे इक घर ढूँढता हूँ,
यही क्या मेरी नक्बत है ?नही तो

ग़ज़ल
हेमंत कुमार मानिकपुरी
भाटापारा छत्तीसगढ़