Tuesday, 28 August 2018

माँ दुआ भी है

1121/2121/2

फ़इलातु /फ़ाइलातु/फा

माँ दुआ भी है वफ़ा भी है

मेरी  दर्द  की  दवा  भी है

माँ को कैसे भूल जाऊँ मैं

वो सदा भी है ख़ुदा भी है

हो तू ही मेरी माँ हर जनम

यही रब से इल्तिजा भी है

माँ वो धागा है पतंग की

जो उड़ा भी है कटा भी है

मैं रहूँगा कैसे बिन माँ के

ये ख़ला से दिल डरा भी है

ग़ज़ल

हेमंत कुमार मानिकपुरी

भाटापारा

ख़ला-शून्यता


Tuesday, 24 July 2018

कटही रमकेरिया

कटही रमकेरिया  हे तोर सुवाद  निराला,
खेड़हा, कोचयी ,कोचयी पान के इड़हर पुराना।
डुबकी, कमसयीया, कोंहड़ा लागे बढ़िया,
वाह रे !भांटा मुरयी जिमि कांदा के साग ॥

वाह रे !भाटा..........

तोरयी ,बरबट्टी अउ लौकी के साग,
कटहर ,परवर के अलगे हे  मिठास।
चुटुक ले तरूहा भुंजुआ करेला संगवारी,
आलू एति कहत हे मै सब साग के बाप॥

वाह! रे भांटा..........

अदवरी बरी रखिहा बरी बर बोहे लार,
मुनगा संग फदके झुरगा आए हे बजार।
बटुराली सेमी बर  मन कतका ललचाए,
बंधा ,फूलगोभी अउ बटकर के करले बात ॥

वाह रे! भांटा..........

टिंडा ,कुंदरू ,चरचुटिया आनी बानी,
ढेंश कांदा मसूर के मिंझरा के का बात।
पिहरी-पुटू मेछरावय बड़ भाव खावय,
खेखसी के सुवाद तो जानत हव आप ॥

वाह रे !भांटा........

किसीम किसीम के इंहा हावय भाजी,
खोटनी ,चरोटा, मुस्केनी के भाजी।
कांदा ,तिनपनिया, गोंदली भाजी मेथी के साग,
लाल भाजी पालकभाजी बथूहा भाजी हे खास॥

वाह रे भांटा मुरयी जिमि कांदा के साग,,,,,,,

रचना
हेमंतकुमार मानिकपुरी
भाटापारा
जिला
बलौदाबाजार-भाटापारा
छत्तीसगढ़

Saturday, 5 May 2018

एक सत्य

मैं जब भी मुझमें उतरता हूँ
तो मैं क्या पाता हूँ!
इक सन्नाटा है
जो जोर जोर से चीख रहा है
अंदर एक घूप्प अँधेरा है
अन्तःकरण मलिनता से भरा हुआ है
और बाहर आकर
मैं अच्छे कपड़े पहनकर
लोगों से मीठी बातें कर
अच्छे विचारो का प्रदर्शन कर
जैसे मुझमें कोई आलौकिक छवि हो!
मैं खुद को छुपा लेता हूँ
यथार्थ को बंदी बनाकर
झूठ को नहला धुलाकर
इस्त्री कर पहन लेता हूँ
यही परम् सत्य है
असत्य को मैं स्वयमेव जीतने देता हूँ
झूठी मान और अभिलाषा के लिए
ताकि मै दुनिया में सर्वश्रेष्ठ बना रहूँ
मेरा अभिमान का मर्दन ना हो.....

रचना
हेमंत कुमार मानिकपुरी
भाटापारा छत्तीसगढ़

Tuesday, 27 March 2018

मैं शून्य हूँ

मौन में मुखर में
शब्द में निःशब्द में
पृथ्वी में भूगर्भ में
सृष्टि में प्रलय में
तेज और निस्तेज में
यथार्थ में परिकल्पना में
शिखर पर खड़ा हुआ
मैं शून्य हूँ

मुझे हर कोई
नगण्य समझता है
पर मै काल जयी हूँ
अनंत के बाद भी बचा हुआ हूँ
अंक के बाद
शब्द के बाद
योग के बाद
समाधि के बाद
शिव के बाद
आज भी बचा हुआ हूँ मैं
मै शून्य हूँ

मैं पराकाष्ठा हूँ
चर और अचर में
उत्कर्ष और निष्कर्ष में
खगोल और भूगोल में
निर्वात में और वायु में
संग्रहण में विपणन में
शंका और समाधान में
उत्कर्ष और अनुत्कर्ष से परे
मैं शून्य हूँ

खुशी और अवसाद में
वर्तमान में भविष्य में
दबा हुआ अतीत में
कलियों में फूल में
भौंरों में मधुमक्खियों में
जात और विजात में
स्नेह और प्रतिघात में
आलोकित खड़ा हुआ
मै शून्य हूँ

देह और विदेह में
आवृत्तऔर अनावृत्त में
भूतल और आकाश में
कोंख और प्राकाट्य में
फतझड़ और बसंत में
सोहंग और विहंग में
सत्य और असत्य में
चुप होकर बोलता हुआ
मैं शून्य हूँ

रचना
हेमंत कुमार मानिकपुरी
भाटापारा



Tuesday, 13 February 2018

दोहा गीत


संस्कृति भारत की रही,जग में सदा महान।

वेलेन्टाइन  डे  नहीं ,भारत  की  पहचान।।

वेलेन्टाइन डे नही....

युगल जान लें बात ये,छोड़ें मिथ्या भान।

अपनी श्रद्धा भेंट करें,जननी को श्रीमान।।

वेलेन्टाइन डे नही....

लज्जा तो है ही नहीं,ना दुनिया का भान।

बाँहों में  बाँहें  भरे, करते  अधर  मिलान।।

वेलेन्टाइन डे नही....

मंत्र  मुग्ध  क्यूँ  हो रहा,धर अपना अज्ञान।

संगत  झूठे  प्रेम  की , समझो  रे  नादान।।

वेलेन्टाइन डे नही....

प्रेम  समर्पण  त्याग  है, प्रेम  नाम  अवदान।

खुदी राम से सीख  लें, देश  प्रेम  का  ज्ञान।।

वेलेन्टाइन डे नही....

बुद्ध  कबीरा  सा  बनें,जग की गौरव गान।

प्रेम  की  देवी  यहीं , मीरा  को  लें  जान।।

वेलेन्टाइन डे नही....

रामानुज हो या भरत,जानो तुम बलिदान।

एक सिंहासन ना चढ़ा,संग ,एक भगवान।।

वेलेन्टाइन डे नही....

ये कलुषित संस्कार ना,मर्यादा की शान।

एसी रीति ठीक नही ,समझ मान सम्मान।।

वेलेन्टाइन  डे  नही , भारत  की  पहचान...

हेमंत कुमार मानिकपुरी

भाटापारा(नवागाँव)

















ग़ज़ल

22122212, 2212 ,2212
मुस्तफ़इलुन × 4

इक धुँध है कोई जो चली आती  है साया की तरह

अपने  ही  घर  में  हो  गया  हूँ  मैं पराया की तरह

कैसे अदा कर पाता माँ की प्यार की कीमत भला

ये  कर्ज वो  था जो  रहा  मुझमे बकाया की तरह

लोगों  नें जैसा  चाहा मुझको  वैसा मैं बनता गया

अक्सर रहा मैं जिन्दगी  भर इक नुमाया की तरह

सब  लोग  कहते थे बड़े  घर की  बहू थी वो मगर

जीती  रही  जो जिन्दगी  मन्हूस  आया  की तरह

पहचान  भी  पाए  नही  उसकी  सदा  को  देखिए

वो जो  मिलीं थी मुझको सेहरा में इनाया की  तरह

ग़ज़ल

हेमंत कुमार मानिकपुरी

भाटापारा (नवागाँव)

                                 हेमंत

Monday, 12 February 2018

हरिगीतिका




करिया दिखे तन साँप लटके,भूत मन हे संग मा।

बइठे हवय अरझट जघा जी,राख पोते अंग मा।।

हे  तीन  नैना  भाल  सोहय , कंठ नीला रंग मा।

गाँजा  धरे , हे  चाम  बैठे,रत हवय जी भंग मा।।


गंगा  धरे  हे अउ  जटा  मा, चाँद  सुघ्घर  हे दिखत।

कुन्डल सजे हे कान चमकत,भाल चाकर हे दिखत ।।

कंठी सजे गर मा हवय जी,राख  तन भर हे  दिखत।

पहिरे खड़ाऊँ गोड़ मा शिव,रूप  मनहर हे  दिखत।।


ग्यानी  हवय  ध्यानी  हवय ,देव  हे  विकराल  जी।

सुर,नर,मुनी हो या असुर तन,आय ओकरे लाल जी।।

भोला समझ झन भूल कर हव,पाप बर हे काल जी।

तांडव करय गुस्साय कटकट,नेत्र खोलय लाल जी।।


पीरा  हरे  रावन  असन  के , मोह  मा  बइहा  रहय।

ठोकर लगय जब पाँव मा भी,खुश हवँव मैं तो कहय।।

सिधवा निचट तो आय ओ हर,बेल पाना बर मरय।

जादा नही थोरिक मया मा, भक्त बर  हपटे  परय।।

हेमंत कुमार मानिकपुरी

भाटापारा (नवागाँव)

छत्तीसगढ़