Sunday, 19 February 2017

2212/2212/2212

सूखे गुलाबों को जलाया क्यूँ नही,

टूटे हुए रिश्ते मिटाया क्यूँ नही।

गर थी मुहब्बत तुम्हे हमसे तो बता,

नज़रें मिलाके सर झुकाया क्यूँ नही।

बातों में जब हर जिक्र मेरा होता था,

उसने मुझे कुछ भी बताया क्यूँ नही।

आते रहे छत पे बहाने चाँद के,

आलम ये था तो मुस्कुराया क्यूँ नही।

जब था तसव्वुर मे हरिक आरा मेरा,

हाथों मे अपने फिर सजाया क्यूँ नही।

ग़ज़ल

हेमंत कुमार मानिकपुरी

भाटापारा।  छत्तीसगढ़


Saturday, 18 February 2017

२१२२/२१२२/२१२२

राख शोलों का लपट गर माँगता है,

फिर तबाही का वो मन्जर माँगता है।

मै पिला देता उसे पानी मगर वह,

खून का पूरा समन्दर माँगता है।

उम्र भर जिसको नचाया ही गया था,

रूह वो अब भी कलन्दर माँगता है।

खेल है अब जिन्दगी से खेलना भी,

अब जिसे देखो वो खन्ज़र माँगता है।

जो नुमाईंदे बने थे आबरू के,

वो हवस का गंदा बिस्तर माँगता है।

ग़ज़ल

हेमंत कुमार मानिपुरी

भाटापारा छत्तीसगढ.

8871805078







Wednesday, 15 February 2017

122/122/122/122

हरिक सख्स तेरा दिवाना है साकी,

ये दुनिया तो पीना पिलाना है साकी।

नशे मे रहा हूँ मै हरदम ये सच है,

तुझे पी लूँ तो होश आना है साकी।

यूँ ही लोग बदनाम करते हैं तुझको,

खुशी का तू सच मे ख़जाना है साकी।

ये दुनिया मुझे समझ ता है जो समझे,

यहीं पर मेरा बस ठिकाना है साकी।

वो जो गालियाँ दे रहा था तुझे कल,

वो भी आज तेरा दिवाना है साकी।

ग़ज़ल

हेमंत कुमार मानिकपुरी

भाटापारा

छत्तीसगढ़

Monday, 23 January 2017

२२१२/२२१२/२२१२

मै तो हवा हूँ मेरा कोई घर नही,

मेरी रवानी है मेरा कोई घर नही।

उड़कर चलूँ मै आसमाँ ये चाह है,

पर बेटी हूँ मेरा तो कोई पर नही।

तूफाँनो से वो खूब खेला करती है,

क्या ताक पे रख्खे दिया को डर नही?

मेरे हवाले भी करो कोई सहर,

इन आँखो को अंधेरे की आदत नही।

मुझमे ही खोता जा रहा हूँ वक्त-दर,

अब निकलने का हौसला बाहर नही।

देखो ये सूरज चढ़ गया है ताक पर,

है पास कोई भी अभी बरगद नही।

ग़ज़ल

हेमंत कुमार मानिकपुरी

भाटापारा छत्तीसगढ़

















Saturday, 21 January 2017

212/212/212/212

भीड़ मे मै अकेला ही चलता रहा,

हम सफर मेरा कोई ना साया रहा।

मेरे अपने कभी साथ थे ही नही,

उम्र भर अपने घर मे तन्हा रहा।

जा के देखा है बाजार मे मैने भी,

पैसों के आगे ईमान बिकता रहा।

साथ देने का वादा किया उसने था,

और वो दुश्मनी ही निभाता रहा।

कैसी ये उलझनो का बुरा दौर था,

पानी थी सामने और प्यासा रहा।

ग़ज़ल
हेमंत कुमार मानिकपुरी
भाटापारा



Friday, 20 January 2017

122/122/122/122

मै खुद से बहुत दूर रहने लगा हूँ,
मै हर रोज सूरज सा ढलने लगा हूँ।

कभी था बसेरा मेरा भी गुलों मे,
मै पतझड़ के पत्तों सा झड़ने लगा हूँ।

दिवारें बना दी गई मेरे घर मे,
मै कैदी के जैसा ही रहने लगा हूँ।

ये मेरा शहर था नही लगता है अब,
मै फिर गाँव का सख्स लगने लगा हूँ।

सफर खत्म होने लगा है मेरा हर,
मै सागर के लहरों मे मिलने लगा हूँ।

ग़ज़ल

हेमन्त कुमार मानिकपुरी

भाटापारा








Wednesday, 18 January 2017

खलिहानो के रूप अनुपम,
नव वधु सा खिला है चितवन,
मेढ़ों पर डाल पवन संग झूमें,
खग गुंजन से भरा है उपवन।

झांकती अंबर से सूर्य किरणें,
रक्ताभ ऊन के गोलों सा दिखता,
देख रहा तरूणवर के ह्रिदय तल से,
अपना झिलमिल सुन्दर चितवन।

धरती ठंड से कांप रही है,
ओस के बूंदो से पत्ते हैं चरमर,
कानन मानो धू धू जल उठा है,
धुआं धुआं है अम्बर का तल।

श्वेत वस्त्र सा दिख रहा है ,
पर्वतों पर हिम का वृहद फैलाव,
झर झर गिरते झरने दिखते,
झुमर हो जैसे वृहद भाल पर।

इठलाती बलखती बेलें तरू पर,
बालों के लट सा अनुपम बिखरा है,
कोमल हरित तृण मखमल हो जैसा,
सज रही धरा बन यौवना चंचल।

रचना
हेमंत कुमार मानिकपुरी
भाटापारा
8871805078