Monday, 19 December 2016

कविता

हो सृष्टि में प्रभात नव,
शुभ्र कर दे कण कण,
हर तिमिर पग वंदन,
हे दिनकर अभिनंदन।

हे दिनकर अभिनंदन....

अवगुण पर प्रतिघात हो,
निशाचरी का सर्वनाश हो,
ज्योति भर दे निष्प्राण पर,
हो मन, सत्य का निस्पंदन।

हे दिनकर अभिनंदन.....

दर्प स्वाहा स्वाहा हो,
हो अनंत ज्ञान प्रकाश पूंज,
हो शिथिल विषधर वृन्द,
उल्रास का हो अवतरन।

हे दिनकर अभिनंदन....

चर अचर प्राणी सजल मे,
वीतराग का हो उत्क्रमण,
हे देव बल पुरूषार्थ दे,
अवनति का हो तिरोहन ।

हे दिनकर अभिनंदन....

समस्त ऊर्जा स्त्रोत धारी,
धरा,अनंत गगन प्रभारी,
तारापथ है, सर्व व्याप्त तू,
कर्ता है ब्रह्मांड का संपादन।

हे दिनकर अभिनंदन....

रचना
हेमंतकुमार मानिकपुरी
भाटापारा
छत्तीसगढ़

Saturday, 10 December 2016

ग़ज़ल

२१२२/२१२२/२१२

है सफ़र तन्हा अकेला जाना है,

अपनी तो बस मौत से याराना है।

अक्श हर इक छूट जायेंगे यहां,

मिट्टी हैं हम मिट्टी मे मिल जाना हैं।

रोने की आदत छुपाकर रखता हूं,

मुझ में भी चोरों का इक तहखा़ना है।

कौन मन्दिर कौन मस्जिद है भला,

बेहतर इससे कसाई खाना है।

इस शहर मे अब जिंदा कोई नही,

बस जिंदा लाशों का आना-जाना है।

ग़ज़ल

हेमंत कुमार मानिकपुरी
भाटापारा
छत्तीसगढ़




Monday, 5 December 2016

ग़ज़ल

१२२२/१२२२/१२२२

दवा बीमार को  मरने   नही देती,

दिवारें छत कभी गिरने नही देती।

वो तूफानो मे कब का ढह गया होता,

तने शाखाओं  को  हिलने  नही  देती।

गज़ब हिम्मत है उस बूढ़ी का सच यारों,

कमर इस उम्र  मे  झुकने   नही     देती।

थी चिठ्ठीयों का अपना ही मज़ा सच मे,

ये जो है फोन खत लिखने  नही   देती।

वो भी हँसता मगर ये हो नही पाया,

गरीबी बचपना खिलने नही   देती।

नदी को पार करना चाहता हूं मै,

ये लहरें नाव को चलने नही देती।

ग़ज़ल

हेमंत कुमार मानिकपुरी
भाटापारा
छत्तीसगढ़


Sunday, 4 December 2016

ग़ज़ल

१२२२/१२२२/१२२२

चलो अब चांद को घर पे बुलाते हैं,

कली सी बेटियों से घर सजाते हैं।

बहू बनकर बहुत जल मर गई है वो,

बहू को बेटियों सा घर दिलाते है।

हरिक आंगन गुलाबों सा महक जाये,

जरा इन बेटियों को हम हँसाते हैं।

बेटी है तो उसे बेटों सा ही पालें,

उन्हे भी आसमॉ तक चल उड़ाते हैं।

बहुत रोती है हर वो रात तकिए पे,

किसी दिन ख्वा़ब मे परियां दिखाते हैं।

मिले पल पल उसे ईज्ज़त का साया,

हवस का आंखो से पर्दा हटाते हैं।

ग़ज़ल
हेमन्त कुमार मानिक पुरी
भाटापारा
छत्तीसगढ़

Tuesday, 29 November 2016

ग़ज़ल

१२२२/१२२२/१२२२
बहर-हजज मुसद्दस सालिम

खुशी पर गम जदा यूं रंग नही रखते,
खियाबां मे नाशादी रंग नही रखते।

चिरागों बांट दो अपनी खुशी सारी,
हमेशा दायरा अपना तंग नही रखते।

दिलों मे प्यार की हो बातें अब सारी,
जेहन मे याद रखना रंज नही रखते।

बहुत प्यारा है ये गुलशन जरा देखो,
अमन के राह मे हम जंग नही रखते।

नसीहत है कभी असफ़ार पर निकलो,
हवा की दुश्मनी तब संग नही रखते।

ग़ज़ल
हेमंतकुमार मानिकपुरी
भाटापारा
छत्तीसगढ़

ग़ज़ल

१२२/१२२/१२२/१२२
बहर--मुतकारीब मुसम्मन सालिम

कंही से उजाले जमी पर तो लाओ,
उठाकर सितारे जमी पर तो लाओ।

अभी रातें सोकर जगी तो नही है,
कभी मेरे सपने चुरा कर तो लाओ।

है माना हुनर है तुम्हे प्यार का पर,
सराफ़त से कोई खुदा घर तो लाओ।

ये आंखे बहुत कुछ बयां कर रही है,
अगर ये मुहब्ब़त है खुल कर तो लाओ।

ये परिंदे कहां उड़ के जायें बताओ,
कि आस्माँ से कोई शज़र घर तो लाओ।।

ग़ज़ल
हेमंत कुमार मानिकपुरी
भाटापारा
छत्तीसगढ़




बहरे रमल मुरब्बा सालिम
२१२२/२१२२

धरती फिर से कांप उठे है,
मुर्दे फिर से जाग उठे है।

सांसे धड़कन आंखे सहमी,
फिर से दानव जाग उठे है।

मिठी बातों पर ना जाना,
सारे नेता जाग उठे हैं।

घर मे फांका है मगर वहां,
सर पे बोतल नाच उठे हैं।

बेटी रोती है दुबक कर,
घाव सारे बोल उठे हैं।

ग़ज़ल
हेमंत कुमार मानिकपुरी
भाटापारा
छत्तीसगढ़

१२२/१२२/१२२/१२२

हिफाजत करे जो मिटाता है क्या,

जलाकर दिये वो बुझाता है क्या।

वो सोता है मगर आंख लगती नही,

गुनाहों का पैकर  डराता है क्या।

धुआं ही धुआं है अभी तक यहां,

किसी ने शहर फिर जलाया है क्या।

इशारों इशारों मे उसने जो कहा,

यूं भी प्यार कोई जताता है क्या।

वो जाकर मुआँ लेट गया कब्र पर,

यूं भी कोई दोस्ती निभाता है क्या।

ग़ज़ल
हेमंतकुमार मानिकपुरी
भाटापारा
छत्तीसगढ़





बहरे खफ़ीफ मुसद्दस मख़बून
२१२२/१२१२/२२

रात के आखिरी शमा तक दे,

साथ देना है तो वफ़ा तक दे।

जब तबीयत को आजमाना हो,

बस दुआ ही नही दवा तक दे।

जान लेना है तो ले लो बेशक,

पर जरा मौत मे मज़ा तक दे।

प्यार मे यूं अंधा नही होते,

मै गुनहगार हूं तो सजा तक दे।

तू अगर दिल से चाहता है तो,

प्यार भी दे हमे बला तक दे।

ग़ज़ल
हेमंत कुमार मानिकपुरी
भाटापारा
छत्तीसगढ़


बहरे मुतकारिब मुसम्मन मक्सूर
१२२/१२२/१२२/१२

नशे मे वो कुछ भी बका करता है,

मुआँ बातें सच सच कहा करता है।

सलीके से मांगा करो तुम कभी,

शराबी बड़ा दिल रखा करता है।

यूं कहते हैं सब लोग वो पीते है,

वो गम मे खुशी को जिया करता है।

सुबह शाम से रात तक बैठा है,

वो रोता है रो कर  हंसा करता है।

वो बीमार सा लगता नही है मगर,

जो किस मर्ज की अब दवा करता है।

ग़ज़ल
हेमंत कुमार मानिकपुरी
भाटापारा
छत्तीसगढ़


बहरे मुतदारिक मुसम्मन सालिम
२१२/२१२/२१२/२१२

प्यार मे फिर सहारा नही मिलता है,

इस नदी का किनारा नही मिलता है।

मै बसर तो हो जाऊं किसी कोने मे,

उसके दिल मे इजारा नही मिलता है।

देख कर दूर से लौट आया हूं मै,

हर जमी को सितारा नही मिलता है।

या खुदा माफ कर तेरे दामन मे भी,

मां के जैसा शकीना नही मिलता है।

इस शहर के हजारों अदायें मगर,

गांव का वो नजारा नही मिलता है।

ग़ज़ल
हेमंत कुमार मानिकपुरी
भाटापारा
छत्तीसगढ़


बहरे मुतदारिक मुसद्दस सालिम
२१२/२१२/२१२

जान कर हारता हूं वहाँ'

इश्क मे बावरा हूं जहाँ।

माँ बचाकर रखी है मुझे,

जलजला है खड़ा हूँ जहाँ।

है दुआ की तरह आज भी,

माँ गई है गया हूँ जहाँ।

पोंछकर अपने आँसू सभी,

वो हँसी है हँसा हूँ जहाँ।

वो तो मुझमें ही जीती रही,

माँ मरी है मरा हूँ जहाँ।

ग़ज़ल
हेमंतकुमार मानिकपुरी
भाटापारा
छत्तीसगढ़








बहरे मुतदारिक मुसम्मन अहज़ज़ु आखिर
२१२/२१२/२१२/२

रहनुमाई की बरसात है क्या।

फिर चुनाओं के हालात हैं क्या।

झुठ भी बोलो अगर तो सही है,

ये नेताओं के शहरात है क्या।

आग है इस पुराने शहर मे,

फिर दंगो जैसा हालात है क्या।

चीखें फिर से सुनाई दे कोई,

बहनो के लूटे अस्मात है क्या।

लोग कितने मजे से यहाँ हैं,

ये शहर के हवालात हैं क्या।

ग़ज़ल
हेमंत कुमार मानिकपुरी
भाटापारा
छत्तीसगढ़


इस पार भी इस गांव के उस पार भी,

बाजार मे बिकने लगे है प्यार भी।

मै कैसे कह दूँ बेवफा उनको कहो,

इस दौर मे ये प्यार भी दस्तूर भी।

मै गैरों से डरता नही माना मगर,

अब बदलने पाला लगे हैं यार भी।

ये दुश्मनी की आग जलने मत देना,

इसने जलाया है कई घर बार भी।

सुन चांद तुझको भी अकेला देखा है,

क्या मेरे जैसा है तेरा तकदीर भी।

ग़ज़ल
हेमंत कुमार मानिकपुरी
भाटापारा
छत्तीसगढ़








 

२१२२/१२१२/२२

जा रहे हो उजाले ले आना,

आसमा से सितारे ले आना

इस शहर मे खराब मौसम है,

गांव से गुल बहारें ले आना।

घर बहुत सूना सूना है कब से,

घर जो आओ खिलौने ले आना।

यूं सुना है वो देता है सबको,

उनके दर से दुवायें ले आना।

जाते हो बेटियों के घर जो तुम,

उनकी सारी बलायें ले आना।

ग़ज़ल
हेमंत मानिकपुरी
भाटापारा
छत्तीसगढ़


बहरे रजज़ मुसद्दस सालिम
२२१२/२२१२/२२१२

गम के हवा को वो हवा कर देती थी,

बीमारी मे मां झट दवा कर देती थी।

ए चांद क्या मालूम भी होगा तुझे,

गालों पे मां तेरा टिका कर देती थी।

जब भी पसीने से नहाकर आता मै,

मां अपनी आंचल से हवा कर देती थी।

डर था उसे मै जल नही जाऊं कहीं,

मां इस लिए लड़ियां जला कर देती थी।

जब रात भर घर मै नही आया कभी,

दरवाजे पे मां रतजगा कर देती थी।

ग़ज़ल
हेमंत कुमार मानिकपुरी
भाटापारा
छत्तीसगढ़


२१२२/१२१२/२२

हमने अपने ही पांव काटे है,

इस सड़क पर के छांव काटे है।

वो परींदा मजे से रहता था,

उनके तो सारे ख्वाब काटे हैं।

दौड़ना चाहती है हर बेवा,

पर ये दुनिया ने पांव काटे है।

वार जिसने किया हमे छुपकर,

उनके तो सारे दांव काटे है।

जानकर जा रहे शहर तुम भी,

उस शहर ने ही गांव काटे हैं।

ग़ज़ल
हेमंत कुमार
भाटापारा
छत्तीसगढ़

१२२२/१२२२/१२२२

कभी तो वक्त ये होगा हमारा भी,

अभी तो रात है होगा उजाला भी।

कमाई सारी तो हमने लगा दी है,

फसल मे इश्क के होगा ईजाफा भी।

ये बिछड़न का जो मौसम है गुजर जाये,

हसीनों का यहीं होगा इशारा भी।

वो पीते हैं तो पीते ही रहें मयकश,

उठा बोतल गुजर होगा हमारा भी।

ये मिट्टी तो बनाती है मिटाती है,

यहां से जल्द ही होगा रवाना भी।

समन्दर है दगाबाजों का ये दुनिया,

भँवर मे देखना होगा किनारा भी।

ग़ज़ल
हेमंत कुमार मानिकपुरी
भाटापारा
छत्तीसगढ़


१२२२/१२२२/१२२२

बड़ी चालाकी से मकसद बनाते हो,

कभी मजहब कभी सरहद बनाते हो।

जलाकर घर धरम के नाम पर तुम तो,

सियासत के बड़े परिषद बनाते हो।

बता किस बात की मिलती सजा हरदम,

हमे तुम तीर का तरकस बनाते हो।

सियासत मैली है ये जानते हो तो,

बताओ क्यूं इसे मसनद बनाते हो।

वो बच्चा है उसे बचपन देना चाहिए,

अभी क्यूं तुम उसे कातिल बनाते हो।

ग़ज़ल
हेमंत कुमार मानिकपुरी
भाटापारा

२२१२/२२१२/२२१२

दिल बेचने भी यार आया कर कभी,

इस इश्क के बाजार आया कर कभी।

दिल टूटने का दर्द अब होगा नही,

इन पत्थरों से दिल लगाया कर कभी।

माना सितारों से बहुत है प्यार पर,

जुगनूओं को घर पे बुलाया कर कभी।

दुनिया अमीरों के मुआफ़िक है मगर,

कुछ घर गरीबी के दिखाया कर कभी।

ये रास्ते बेशक तरक्की के हैं,

पैमाना पर इनका बताया कर कभी।

ग़ज़ल
हेमंत कुमार मानिकपुरी
भाटापारा
छत्तीसगढ़

१२२२/१२२२/१२२२

अगर ये जिन्दगी इक मौतखाना है,

तो बेशक जिन्दगी को आजमाना है।

अगर तुम चांद हो तो चमकते रहना,

मेरी आंखो मे भी मां का उजाला है।

सुनो महलों से कद के नापने वालों,

है मिट्टी का मेरा पर आशियाना है।

ये दरिया भी समन्दर पे फिदा है क्यूं,

जहाँ दरिया को जाकर डूब जाना है।

बहुत पैसे जमा कर डाले उसने तो,

नही जाना के इक दोस्त बनाना है।

ग़ज़ल
हेमंत कुमार
भाटापारा
छत्तीसगढ़q




२१२/२१२/२१२/२

आज तो बच गया बरकतों से,

बाज आ अपनी तो हरकतों से।

उठ खड़ा हो चला कर खुदी से,

घाव भरता नही मरहमो से।

सच ये दुनिया है मत जा इधर तू,

ये भरी है बहुत गमजदों से।

इश्क कर ये बहुत काम का है,

तोड़ नाता सभी नफरतों से।

लेटकर नाप ले इस जमी को,

घर रहेगा यही मुद्दतों से।

तेरा आना है जाना है जिस घर,

उस जगह को बचा जलजलों से।

मौत का क्या है आयेगी इक दिन,

कर कभी दोस्ती दुश्मनो से।

ग़ज़ल
हेमंत कुमार मानिकपुरी
भाटापारा
छत्तीसगढ़

Monday, 26 September 2016

पानी बूंद अमोल हे.....
विधा-------दोहा
मात्रा       १३/११
पानी बूंद अमोल हे, राखव एखर मान।
बूंद बूंद बचावव जल, बात समझलव जान॥

खरचा कर देव पानी, जनम जनम भरमान।
अब धरती ले पानी ह, कति ले आवय जान॥

पानी रहत खूब करे ,छकल छकल तंय जान।
भर भर लोटा नहाये, अब अंजली असनान॥झलशजभी

कपड़ा लत्ता बरतन ल,छिन छिन मांजय सान।
पानी बऊरे अइसे, जइसे पर घर जान॥

टेड़ा नल झुख्खा हवय,नल बन गे हे बांझ।
माथा धर पछतात हे,गुनव ज्ञानी सुजान॥

सब रूख रई काटेव, आंखी मूंद नदान।
जीव जंगल नंदागे हे, तब फरकत हे कान॥

रूख लगावव कोरि त हे, तभे धरा के जान।
अभी ले समझव बात ल, झन बनव ग नादान॥

रचना
हेमंतकुमार मानिकपुरी
भाटापारा
जिला
बलौदाबाजार-भाटापारा
छत्तीसगढ़ok

गरेर आवय मारय बिजरी गिरय पानी,
संझाकुन चुहत हवय घर के ओंरवानी
किसनहा मन के मन गदगद होवत हे,
आगे खेती किसानी के दिन संगवारी॥

भैंसा गाड़ी बईला गाड़ी रात रेंगत हे,
टेक्टर वाले मन ह बनिहार खोजत हे।
सब किसनहा के एके ठन बुता हवय,
घुरवा के खातू पलोवय खेत अउ बारी॥

बबा दाई हर परसा डारा लुवत हावय,
कोठार बारी के परदा पलानी ओईराही ।
झिपार बर बनय राहेर काड़ी के झिपारी,
खपरा लेवागे छान्ही ओईराय पारी पारी ॥

छेना खरसी झिंटी चिरवा सकलात हवय,
कोठा म पईरा बने कस कस धरात हवय।
मालमत्ता के नवा जुन्नी करत हे किसान,
कहे किसनहा गिरतिस पानी धारी धारी ॥

सुसईटी के खातु घर घर धरावत हवय,
कोठी ले सुघर बिजहा मन हेरावत हवय।
डांड़ी लेवागे नांगर पजावय घर लोहारी,
गोड़ा तरी के रांपा अउ हेरागे हे कुदारी ॥

मेढ़ मेर करत हवय उलट के चिनहारी,
डबरा खोचका के हे आगे पाटे के पारी।
कांटा खुंटी ल बिनव आवा खेत चतवारी,
सावन के पहिली जतन लव खेती बारी॥

अंकरस जोताय बने भूंईया ह खेतीहर,
थरहा लईहरा के करत हवय तईयारी।
सावन भादो किसनहा भरय किलकारी,
कहे सम्मत होही तभे छुटातिस उधारी॥

रचना
हेमंतकुमार मानिकपुरी
भाटापारा
जिला
बलौदाबाजार-भाटापारा
छत्तीसगढ़ok


बहर -मुतकारिब मुसम्मन सालिम
अरकान -१२२/१२२/१२२/१२२
रदीफ़-है
काफ़िया-अर

ज़रा सी झड़फ का हुआ ये असर है,
सियासी कहर ने जलाया शहर है।

कि बांटा गया है जहर हर किसी को,
कंहां खो गया जो अमन का शहर है।

खुदा खो गया राम भी अब नही है,
लगाकर सफ़ेदा लिखा यह शहर है।

नमी आंख की कौन देखे यहां कब,
न तेरी जरूरत न मेरा शहर है।

किसी ने किसी पर छुरा है चलाया,
कि "हेमंत" दंगों का यही वह शहर है।

ग़ज़ल
हेमंत कुमार मानिकपुरी
भाटापारा
छत्तीसगढ़ ok

बहर -रजज मुसद्दस सालिम
अरकान-२२१२/२२१२/२२१२
काफ़िया-आन
रदिफ़-है

पैसा यहां/सब का खुदा/भगवान है,
कोई नही/सच का बता/पहचान है।

बैठी गरी/बी घर बिका/है इक तरफ़,
है इक तरफ़/कोई बना /धनवान है।

सौ बार जल/जाते दिये/जल ना सका,
हर दम चली /आती ख़फा/तूफ़ान है।

बाजार मे /सब बेचकर /आया चला,
अब जिस्म है/टूटा हुआ/अरमान है।

देते हमा/रा हक बता/वो इस तरह,
जैसे रहा/हम पर अदा/एहसान है।

ग़ज़ल
हेमंत कुमार मानिकपुरी
भाटापारा
छत्तीसगढ़ok










१२२२/१२२२/१२२२/१२२२

                                        
परींदे सर/हदों की सब/दिवारें तो/ड़ उड़ते हैं
यहीं हम है/वतन पर भी/सियासी बा/त करते हैं।

जमा है खू /न का कतरा/किसी मां के/दुपट्टों पर
अमन की रा /ह पर पहरा/अंधेरी रा/त करते है।

खुदी को अब/ खुदी से आ/ज हम बदना/म करते है
किसी की नफ/रतों को हम /शराबी जा/म करते है।

जिसे अपने /हरम की जां/हिफ़ाजत भी/नही आया
रगड़कर आं/ख ये अब भी/मलालें शा/म करते है।

उजालों ने/कभी हमको/नज़र भर भी/नही देखा,
गरीबी के/मकानो पर/कहां ये चां/द करते है।

ग़ज़ल
हेमंतकुमार मानिकपुरी
भाटापारा
छत्तीसगढ़ok

बहर-रमल मुसम्मन सालिम
अरकान-२१२२/२१२२/२१२२/२१२२
काफ़िया -अन
रदीफ़   -पर

देख तो कैसे मिटा कर ये जवानी इस वतन पर,
सर कटाना याद करेगी ये ज़माना इस वतन पर।

मौत के संग से खुली थी देख आंखे इस तरह नम,
देख ले वह आज भी है रत जगा सा इस वतन पर।

ख़ौफ़ कब था मौत का जो अब रहेगा ऐ सितमगर,
शीश कट जाते यहां हरदम हजारों इस वतन पर।

फ़ूल जाती इस धरा पर शेरनी मां तेरी छाती,
मां चरन पर ये सिपाही मर मिटे जब इस वतन पर।

मौत से यारी निभाने खून से रंग दूं  कफ़न भी,
आरज़ू है हर जनम मेरा यही हो इस वतन पर।

ग़ज़ल
हेमंतकुमार मानिकपुरी
भाटापारा
छत्तीसगढ़ok

धक धक करते सीने से देखो,
कोई निज प्राण निकाले जाता है।
मेरी मां की धड़कन से बतलाओ,
कोई कश्मीर निकाले जाता है॥

आबादी बर्बाद हो रही है जवां,
कोई केसर कैसे यहां खिलाएगा।
चीनारों के जंगल से कोई हत्यारा,
दिन रैन चैन उड़ाने आमादा है॥

सिन्धु की अंतरमन यही कहती है,
सुन लो भारत के वीर सपूतों तुम !
उखाड़ फेंको इन पत्थर बाजों को,
जो कशमीर को नापाक बनाता है॥

चेनाब रोती है झेलम रोती है देखो,
डल वुलर और झील नागिन रोती है।
हिमालय की आंखो पर देख आंसू ,
ये वादी -ए- जन्नत सिहरा जाता है॥

बहकावे मे न आना नौजवानों तुम,
ये अपनों के नही होते तो तुम्हारे कैसे?
इनको मतलब है बस खून बहाने से,
गंगा जमुनी तहज़ीब इनको न भाता है॥

रचना
हेमंतकुमार मानिकपुरी
भाटापारा
जिला
बलौदाबाजार-भाटापारा
छत्तीसगढ़ok


श्रृंगार की कविता
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मधु मिलन की बेला,
शहद तार तार हो रहे हैं,
व्याकुल दोनो अंतर्मन,
पीयूष अधरों से पी रहे हैं।

देंह दहक दहक रहे हैं,
सांसें उधड़ बून कर रही है,
जब चक्षु मिले ह्रदय तल से,
अंबर धरती पर बरस रहे हैं।

उमंग भर आई है जीवन मे,
विरही दिन बिसर गये हैं,
सच्चा प्रेम का अर्पण पाकर,
मुरझाई यौवन तर हो रहें है।

प्रेम के अद्भुत आंगन में,
पायल झुमके खनक गये हैं।,
कंगन चूड़ी बिंदीया गज़रा,
सब पिया पिया ही बोल रहे हैं।,

जब जब बांहों की वरमाला,
प्रियतम प्यारे मुझ पर वारे हैं,
मधुशाला की हाला बहती है,
अधरों पे प्याले रस घोल रहे हैं।

रचना
हेमंतकुमार मानिकपुरी
भाटापारा।
जिला
बलौदाबाजार-भाटापारा
छत्तीसगढ़ok

पहिली पूजा हे भोर,लंबोदर जय तोर,
बिगड़े काम बनईया, काज बना दे मोर।

दाई पारबती हवय,ददा हे शिवा तोर,
कातिक नाव के एकझन,भाई हे जी तोर।

दांत बड़े हे एके ठन,पेट हवय बड़ तोर,
चढ़े मुसुक के सवारी,चार भुजा हे तोर।

एक हांथ म शंख धरे हे,दुजे कमल हे तोर,
तीजे हाथ भोग धरे,चौथा अशीष तोर।

सुपा कस हे कान बड़े,केंश ह लहरी तोर,
रिद्धी सिद्धी चंवर कर,सेवा करथे तोर।

फूल चघे पाना चघे,फल चघे हवय भोग,
लाड़ू तोर परसंग के,उदर ह भारी तोर।

अगियानी ल गियान दे,हर रोगी के रोग,
पाये सुख धान धन हे,जेन जय करे तोर।

रचना(दोहा१३/११)
हेमंत कुमार मानिकपुरी
भाटापारा
छत्तीसगढ़ok


दोहा
(13/11)

मोर माटी बंदन करंव,चरन अंचरा पखार,
खावत हमन बने बने ,मया म तोर अपार।

तोर छाती ले उपजे,धान गंहू भरमार,
चना राहेर तींवरा,भरय कोठी हमार।

निकले नंदिया झोरकी,रूख राई पहाड़,
हरा हरा चारा चरे,गाय बछरू कछार।

आनी बानी भरे हे,धरती खनिज भंडार,
लोहा तांब कोईला ,चूना अगम अपार।

कोरी कोरी तिहार म,किसीम के पकवान,
सबके अपन धरम करम,हवन भाई समान।

गांधी अंबेडकर लागे ,देश सपूत महान ,
भगत राजगुरू जनमे,बन के हे भगवान।

कोनो साड़ी ल पहिरे,कोनो हे सलवार
कोनो धोति पहिरे हे,कोनो ह चुड़ीदार।

हिंदू मुसा सिख्ख हवय,भारत के पहिचान
बौद्ध जैन ईसाई,म हवय धरम हमार

ऊंच निच ल टोरके हे,बने हवय संविधान,
सब ल एके अधिकार हे,सबके अपन बिचार।

इंहा अनेकता म हवय ,एकता के भरमार,
शीश नवे मोर धरती,तोर बर बारंबार।

रचना
हेमंत कुमार मानिकपुरी
भाटापारा
छत्तीसगढ़ok

अरकान
२१२२/२१२२/२१२२/२१२२
बहर-----
रमल मुसम्मन सालिम
तर्ज---
ला ल ला ला

आजकल के नौजवानो का बहाना राम जाने
सीखना ये काम करना कब करेंगे राम जाने।

आंख पे है बाल बिखरे रोज बनठन मस्त
निकले,
ये बहकना अब भला बंद कब करेंगे राम जाने।

शौख है तो भी रखे हद मे कदम अपने मुहाने,
मयकशी को छोड़ना बंद कब करेंगे राम जाने।

टूट जाते हैं उक़ूबत के हलक पर सादगी भी,
बेचना ये ज़ाबिता बंद कब करेंगे राम जाने।

आज कम है कल ज़ियादा आग लग जाती कंही है,
यूं जलाना अब शहर बंद कब करेंगे राम जाने।

ग़ज़ल
हेमंत कुमार मानिकपुरी
भाटापारा
छत्तीसगढ़ok

२२१२/२२१२/२१२२

दुश्मन सल़िकेद़ार जब घर पे आया,
उसने छुरा इस बार दिल पे चलाया।

जां से बढ़कर पा लिया था जिसे मै,
ये इश्क़ तो अब जान लेने पे आया।

उस पार दरिया के खुशी का शज़र है,
परिंदा हजारों ख्वाब ले उड़ के आया।

दौलत मुहब्बत शोहरत आरज़ू सभी
ये फ़ालतू क्या क्या सितम ले के आया।

शाईर ने बस एक खता क्या किया तो,
पूरा शहर घर गाल़ियां मढ़ के आया।

ग़ज़ल
हेमंतकुमार मानिकपुरी
भाटापारा
छत्तीसगढ़ok








बहर-रजज मुसद्दस सालिम
२२१२/२२१२/२२१२
तर्ज- ला ला ल ला

मैं चार सिक्के भी बचा पाया नही,
तूफां बताकर तो कभी आया नही।

मजबूरियां क्या क्या रही होंगी तभी,
ये मौत भी खुलकर अभी आया नही।

बस चाहता था दो घड़ी सावन रहूं,
बरसात तो इस साल भी आया नही।

बांटा करो तुम राम को बांटो खुदा,
इसके सिवा कुछ काम तो आया नही।

एक चांद पर एतबार ही था बस हमे,
वो भी मगर छत पर कभी आया नही।

ग़ज़ल
हेमंत कुमार मानिकपुरी
भाटापारा
छत्तीसगढ़ok




२१२२/२१२२/२१२२
बहर--रमल मुसद्दस सालिम

गांव की तुम आब़दाना याद रखना,
नीम बरग़द और सावन याद रखना।

चांद तारे आसमा गर मिल भी' जाये,
तुम हमेशा घर गरीबी याद रखना।

जा रहे हो तुम अगर घर छोड़ कर तो,
देख मां की चार बातें याद रखना।

रोज बूढ़ी आंखें' तकती राह होंगी,
अधमरी सी जान वो तुम याद रखना।

लील जाती है शहर ईमान सब कुछ,
शाम को निकलो मगर घर याद रखना।

ग़ज़ल
हेमंतकुमार मानिकपुरी
भाटापारा
छत्तीसगढ़ok