ये सच कहने की हिम्मत है?नही तो,
कोई दिल में बगावत है? नही तो।
सदा-ए-दिल ही चाहत है?नही तो
मुहब्बत इक जियारत है?नही तो,
अकेला घर, अकेले कैद हो तुम
बुढ़ापे की ये कीमत है?नही तो
मेरी आँखें है गहरा इक समन्दर
तुम्हे लहरों की आदत है?नही तो
बहुत खामोश है वो कुछ दिनों से
किसी से कुछ शिकायत है? नहीं तो
हैं जिंदा लाशें हम सब इस जहाँ में,
ये सच सुनने की जुरअत है?नही तो
मै अपने घर मे इक घर ढूँढता हूँ,
यही क्या मेरी नक्बत है ?नही तो
ग़ज़ल
हेमंत कुमार मानिकपुरी
भाटापारा छत्तीसगढ़
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