Wednesday, 2 October 2024

एक लड़की

                    एक लड़की


हाँ  एड़ियों  के  बल  पर  लपकती  लड़की
अच्छी   लगतीं   हैं   बेर    तोड़ती   लड़की


सूरज   उठाये   सर   पे    मटके  की  तरह
सुबह  हुईं  नही  कि  गाँव  नापती   लड़की


माथे    से    पसीना   पोंछती   है   थककर
धूप   सँग   फिर  बतियाती  खेलती लड़की


तानो   का    कुर्ता   है   लाज  की   ओढ़नी
बड़ी   मुश्किल   से  सजती  सँवरती लड़की


ये  खुशियाँ   भी   रोज   ही   दरक जातीं हैं
रोज  अपनी   किस्मत   से  हारती   लड़की


काश  कहीं  मिल  जाती   दौड़ती  उछलती
लंबी   सी   चोटियों    को   छेड़ती   लड़की


हेमंत कुमार "अगम"
भाटापारा छत्तीसगढ़
रचना श्रेणी-सजल























Wednesday, 25 September 2024

कविता नुमा ग़ज़ल


शहर   का    हर    शख़्स   तेरा   दीवाना है
कोई     पागल     है    कोई     मस्ताना   है


हर  किसी   को बहुत  प्यार से  पिलाती हो
ये    तेरी    आँखें      क्या   शराबख़ाना  है


उसने    बालों    को   यूँ   झटकाया   होगा
आज  मौसम  हुआ   किस कदर सुहाना है


मेरी  आँखों  में  उतरने  की भूल मत करना
ये तो लावों का जलता हुआ इक ठिकाना है


मिट्टी    से   प्यार  करना   सीख    लो  भाई
इसी  मिट्टी   में   एक   दिन  मिल  जाना  है


कभी मस्जिद कभी मंदीर में उड़कर आ गये
इन  परिंदों का न कोई मजहब न ठिकाना है


हेमंत कुमार "अगम"
भाटापारा छत्तीसगढ़

बेटी तुमको पढ़ना होगा

बेटी    तुमको     पढ़ना   होगा,
इतिहास   नया   गढ़ना   होगा,

उठो   कलम   से  नाता  जोड़ो,
पढ़ने  से  तुम  मुँह  मत   मोड़ो।
अपने   अधिकारों    को   पाने,
पुस्तक  से  अब  जुड़ना  होगा।।

अँधियारों    से    गहन   लड़ाई,
शस्त्र  है   केवल,  एक   पढ़ाई।
दुनिया  से   लड़ने    के   पहले,
खुद  से  खुद  ही  लड़ना  होगा।।

बिंदी    चूड़ी    कंगन    झुमके,
छोड़ो   तुम  ये   लटके  झटके।
सावन  के झूलों   को तज कर,
तुम्हे   गगन  तक  उड़ना  होगा।।

पग-पग पर क्यों ठोकर खाना,
भीख माँग कर क्यों कुछ पाना।
अपनी    मेहनत    के  बलबूते,
खुद   से   रंग  बदलना  होगा।।


सती   सावित्री  अब मत बनना,
काहे   का   ये    आँहें    भरना।
ममता  प्यार  त्याग के सँग सँग,
काँटों   में   भी    ढलना   होगा।।

पीछे    मुड़कर     पछताने   से,
लाभ    कहाँ    रोने   गाने    से।
जीवन  की   क्यारी  में  तुमको,
खिलना   होगा   फलना   होगा।।

बेटी    तुमको     पढ़ना   होगा,
इतिहास   नया   गढ़ना   होगा.....


हेमंत कुमार "अगम"
भाटापारा छत्तीसगढ़
6/10/24 पत्रिका काव्यंजली में प्रकाशित








Sunday, 15 September 2024

गीत

पल दो पल का प्यार-व्यार है,
फिर   तन्हा  भी  रहना  होगा।
जिन  आँखों  से  देखे  सपने,
उन  आँखों   से  रोना   होगा।।


दाढ़ी    मूँछें     लंबी  -  लंबी,
बाल      जटा    वाले     होंगे।
धोबी   जैसा   कुत्ता   बनकर,
'घर  न  घाट' भी  होना  होगा।।


चैन-वैन    सब   खो   जाएँगे,
रातों     तारे     गिनने    होंगे।
चंद्रकांत   की    शीतलता  में,
सूरज   जैसा   जलना   होगा।


रिश्ते-नाते          यार-दोसती,
अम्मा-बापू      खो     जाएँगे।
घूम-घूम    कर  गली मुहल्ला,
पागल   जैसा   रहना   होगा।।


गम  के  आँसू  मदिरालय  में,
मय   पी   कर   पोंछे  जाएँगे।
टूट  चुके  दिल   के प्यालों में,
तन्हाई   भर    पीना    होगा।।


दुख ,पीड़ा   सँग - साथी होंगे,
और नही   कुछ हासिल होगा।
जी कर   मरना मर कर जीना,
इक दिन फिर खो जाना होगा।।



पल दो पल का प्यार.......


हेमंत कुमार "अगम"
भाटापारा छत्तीसगढ़





Saturday, 7 September 2024

मेरी माँ...

मेरी   माँ   भी  अजब-गजब  है,
बात  समझ  यह  अब  आया है।
छलनी     से     धूप    छानकर,
उसने    छत    पे   सूखाया   है।।

तिकड़म   बाजों    को   यूँ   ही,
पल     में     धूल    चटाया   है।
जिसने     अवकात       बताया,
माँ   ने   उसको   नचवाया    है।।

दुर्गा     काली      रनचंडी     है,
बनी   लताओं   सी   काया   है।
कभी  कूटती  है   जी  भर  कर,
कभी  प्यार की   वह  छाया  है।।

पत्थर   को  भी  सोना  कर  दे,
एसी      उसकी      माया     है।
माँज-माँज कर घीस-घीस कर,
मुझको  चम-चम   चमकाया है।।

जहाँ-जहाँ   पग   धारे   अम्मा,
वैभव  चलकर  खुद  आया  है।
कांटों   वाले    घर  आँगन  को,
फूलों   से   भर  महकाया    है।।

उस   ममता  की  मूरत  का हम,
आओ हम पल-पल ध्यान करें।
जिसके  आँचल  में  सदियों सें,
निर्मल   ममता  सुख  पाया  है।।

हेमंत कुमार "अगम"
भाटापारा छत्तीसगढ़
रचना श्रेणी-गीत

Friday, 6 September 2024

कविता नुमा ग़ज़ल


प्यार-मुहब्बत  में झगड़ा भी करना पड़ता है
घर  है तो घर को  जिंदा भी  करना पड़ता है

चुल्लू भर पानी में क्या बुझती है प्यास कभी
चुल्लू को दिल का दरिया भी करना पड़ता है

रंगो  से  भी  जीवन   में  होता  उबकाई  पन
फिर से  जीवन को सादा भी करना पड़ता है

दुनिया आसानी  से  मान जाय,ये छोड़ भरम
दुनिया से  वादा , झूठा भी  करना  पड़ता  है

ज्यादा भी  मीठा  रस  काम नही आता प्यारे
जीवन  को  खट्टा कड़वा  भी करना पड़ता है

झूठों   के   पौ-बारह    होते    हमने  देखे   हैं
सच  को  तो  रोना-धोना  भी करना पड़ता है

हेमंत कुमार "अगम"
भाटापारा छत्तीसगढ़
रचना श्रेणी-कविता



 

Wednesday, 4 September 2024

कविता नुमा ग़ज़ल

पीड़ा    में   आनंद    घुला  है
काँटो  में  ज्यों  फूल खिला है


प्यार  करूँ या  फिर दूँ  गाली
एक  पुराना   दोस्त   मिला  है


मेरे  घर   जिस  दिन  आओगे
कहना  होगा   इश्क  बला   है


कितने  वर्षों     के   बाद   सही
रस्ता  मुझको  एक    मिला   है



हँसना- वसना  सीख-साख ले
हँसना   भी  तो  एक  कला है


राजाओं   की  हर   बाजी   में
प्यादों   ने   भी  दाँव   चला है


हँस्ता   गाता   रहता   हूँ   पर
मेरे    भीतर    एक   ख़ला  है


हेमंत कुमार "अगम"
भाटापारा छत्तीसगढ़
रचना श्रेणी- कविता







Monday, 26 August 2024

जंगल का सैर

आओ-आओ    जंगल    जायें,
पर्वत    घाटी    पर    इठलायें।

पगडंडी    पर   हम   बलखायें,
पेड़    लताओं    से    बतियायें।
भाग-दौड़   तितली   के    पीछे,
चिड़ियों के  सँग-सँग उड़ जायें।।


रेतीली     नदियों    में    जाकर,
तैर - तैरकर      खूब      नहायें।
झरनों  के   सँग  हँसी  ठिठोली,
नाचें   -   कूदें     झूमें  -    गायें।।


पेड़ों   पर    बंदर   दिख   जाये,
गिलहरियों   से  मिलकर  आयें।
तेज    भागते     खरगोसों    से,
हम  सब  मिलकर  रेस लगायें।।


नील   गाय   वन  भैंसा  चीतल,
खोजे    इनको    घूम - घूमकर।
अगर   दिखे  तो  बड़े  प्यार  से,
देखें    सबको    और   दिखायें।।


पेड़ों   के    झुरमुट    में    देखो,
शायद  बब्बर    भी  दिख जाये!
भालू     दादा   के  घर   जाकर,
मीठा   ताजा     मधुरस    खायें।।

आओ-आओ    जंगल    जायें,
पर्वत    घाटी    पर    इठलायें......

हेमंत कुमार "अगम"
भाटापारा छत्तीसगढ़

















Sunday, 25 August 2024

सूरज

सुबह - सुबह  सूरज  आता  है
धूप - रौशनी    सँग   लाता   है

सूरज   पहले   आकर  पोखर
मुँह   धोता   बाल  सजाता  है


पेड़ों   के   झुरमुट   में   सूरज
धूपों    का    तार   बनाता   है


ओस  भरे  मकड़ी  जालों  पर
रंगों   का   धनुष   खिलाता  है


सूरज   पेड़ों   की   फुनगी  पर
चिड़ियों  के   सँग   इतराता  है


सूरज   बागों   में   जब   आता
तितली   भौंरों   सँग   गाता  है


दो - पहरी  में  फिर  सूरज  को
इतना    गुस्सा   क्यूँ   आता  है 


भूखा -प्यासा  दिन  भर  सूरज
शाम   ढले   तब  घर  जाता  है


हेमंत कुमार "अगम"
भाटापारा छत्तीसगढ़






Saturday, 17 August 2024

नागू टीचर

नागू टीचर बीन  बजाकर,एकदम  मस्त  पढ़ाते।
बीच बीच में स्वयं  नाचकर,सबको भी नचवाते।।

जोकर  वाला  उनका कपड़ा,रहता थोड़ी ढीली।
आँखों  पर मोटा  सा चशमा,टोपी  सर पे पीली।।

तरह - तरह के कार्ड बोर्ड पर,सुन्दर चित्र बनाते।
दीवालों पर लिख लिखकर ,बच्चों को समझाते।।

कंकड़ - पत्थर कंचे से ही, जाने क्या  कर जाते।
जोड़ -घटाना  का  जादूगर, इसी लिए कहलाते।।

हाथी  भालू  बंदर बब्बर,मिलकर पाठ समझते।
तोता  मैना  सारस  बगुला , हँसते-हँसते  पढ़ते।।

कोई  नागा  ना  करता था, झटपट शाला आते।
नागू  टीचर  फोकट में ही , सबको  रोज पढ़ाते।।


हेमंत कुमार "अगम"
भाटापारा छत्तीसगढ़



Sunday, 11 August 2024

आँखें

                 आँखें

काली    आँखें    भूरी   आँखें
किसी  किसी की नीली आँखें


चुप    होती  पर  करती  बाँतें
रोती    गाती    हँस्ती    आँखें


देख-देख  कर   प्यार  जतातीं
गुस्सा  कभी  दिखाती   आँखें


दिन  भर  सबको ताड़ा करती
रात-रात    भर   सोती  आँखें


जंगल   नदियाँ   पर्वत  सागर
कभी गगन  दिखलाती  आँखें

 
हेमंत कुमार "अगम"
भाटापारा छत्तीसगढ़







Saturday, 10 August 2024

मुसुवा भाई

मुसुवा   भाई   मुसुवा  भाई,
काबर  कुतरे    मोर   रजाई।

दाँत   आय  या  धरहा आरी,
सबो जिनिस ला कुतरे भारी।

लुगरी  ,कुरथा ,कथरी ,चद्दर,
पलंग   सुपेती नाचय थरथर।

डब्बा-डिब्बी   चेंदरा-फरिया,
काटे   बर  का खाये किरिया।

बिला  करें हस जी तैं घरभर,
रोज-रोज   रहिथस आने घर।

मुसुवा  कहिथे   रोवत-रोवत,
कुतरे ला परथे जागत सोवत।

दाँत   बाढ़थे   रोजे   सरलग,
पीरा  मोर  दुनिया  ले बिलग।


हेमंत कुमार "अगम"
भाटापारा छत्तीसगढ़
श्रेणी - बाल कविता

Friday, 9 August 2024

बादल तो जोकर लगता है

बिल्ली  फिर   बन्दर   लगता   है
बादल   तो   जोकर   लगता    है

भालू    जैसा    रुप    है    कालू
बादल    उल्लू    पर   लगता   है


गिरगिट    जैसा    रंग    बदलता
बादल     जादूगर     लगता     है


मोर-मोरनी   पल    में     बनकर
बादल   फिर    तीतर  लगता   है


बादल    में   सब    कहते   पानी
धुआँ-धुआँ   सा   पर  लगता   है


कभी   बरसता   कभी  चमकता
तड़का  तो  फिर   डर  लगता  है


आसमान    में     फिरता   रहता
बादल    तो    बेघर    लगता   है


हेमंत कुमार  "अगम"
भाटापारा छत्तीसगढ़

पेड़ लगाना आता तो है

                                  पेड़ लगाना

                                  आता तो है..!!

                                  खाद डालना

                                   आता तो है..!!

                                    नीर डालना

                                    आता तो है..!!

                                    बाड़ लगाना

                                     आता तो है..!!

                                    बच्चों तब,

                                      कहते हैं

                                    पेड़ लगाना

                                   आता तो है...

                                    हाँ हाँ हाँ हाँ


हेमंत कुमार  "अगम"
भाटापारा छत्तीसगढ़

Thursday, 8 August 2024

झगड़ेला केकड़ा

               एक  केकड़ा
             बड़ा झगड़ेला
           दो  मछली से 
     भिड़ा अकेला  

                    तीन मेंढक 
                         दौड़े आये
                                केकड़ा जी को
                                           धाँये धाँये

                केकड़ा का न खैर
               फैक्चर चारो पैर
               अस्पताल में,
         पाँच दिनों तक
करता रह गया सैर



             हेमंत कुमार "अगम"
             भाटापारा छत्तीसगढ़

Wednesday, 7 August 2024

कपास

                कपास 

मैं   कपास  हूँ सुन लो भाया,
मैं  आया   तो  कपड़ा आया।

मेरा  फल  जब पक जाता है,
अन्दर    रूई   बन  जाता  है।

'बुनकर' भैया  काते  मुझको,
तब  मिलता  है धागा तुमको।

सब    रंगो  में  डाला  जाता,
रंगीला   मैं    बनकर   आता।

जब  'करघा'  से बुनता हूँ मैं,
कपड़ा   बढ़िया  बनता हूँ मैं।

फिर  दर्जी  की  बारी आती,
सिलकर पोशाकें बन जाती।

बड़े   मजे   से  पहना जाता,
हर  मौसम  से तुम्हे बचाता।


हेमंत कुमार "अगम"
भाटापारा छत्तीसगढ़




टिड्डा का स्कूल

               
                  टिड्डा का स्कूल



          टिड्डा के स्कूल में ,

                                  हाथी पढ़ने आया।

           क ख ग घ देखकर,

                                    हाथी जी घबराया।

गाना गाया नाच दिखाया,

                         हाथी जी पर सीख न पाया।

टिड्डा टीचर को गुस्सा आया,

                           छड़ी उडाकर एक लगाया।

रोया गाया हाथी घबराया ,

                         कभी नही फिर स्कूल आया।



हेमंत कुमार "अगम"
भाटापारा छत्तीसगढ़


नोट- रचना में मात्राओं का पालन नही किया गया है।

आखिर मैं कौन हूँ

न पूछ हूँ 
न परख हूँ
न मान हूँ
न सम्मान हूँ
न स्वाभिमान हूँ
आखिर मैं कौन हूँ..
न धूल हूँ
न राख हूँ
न मिट्टी हूँ
न पत्थर हूँ
न पहाड़ हूँ
आखिर मैं कौन हूँ..
न चर हूँ
न अचर हूँ
न मृत्यु हूँ
न जीवन हूँ
न निर्वाण हूँ
आखिर मैं कौन हूँ..
न दिन हूँ 
न रात हूँ
न चन्द्रमा हूँ
न सूर्य हूँ
न आकाश हूँ
आखिर मैं कौन हूँ..
न धरती हूँ
न पाताल हूँ
न खगोल हूँ
न वायु हूँ
न निर्वात हूँ
आखिर मैं कौन हूँ..
न ठंड हूँ
न गर्मी हूँ
न जल हूँ
न वाष्प हूँ
न बरसात हूँ
आखिर मैं कौन हूँ..
न सुख हूँ
न दुख हूँ
न प्रेम हूँ
न विरह हूँ
न क्रोध हूँ
न अवसाद हूँ
आखिर मैं कौन हूँ..

हेमंत कुमार "अगम"
छत्तीसगढ़ भाटापारा
रचना श्रेणी-अतुकांत

Thursday, 1 August 2024

माँ का आँचल


         माँ का आँचल


पानी     जैसा   निर्मल निर्मल,
मेरी   माँ   का आँचल कोमल।


जब  माथे  पर  बहा   पसीना,
माँ  ने  पोंछा  आँचल   झीना।


ठंड   लगे   या   बारिश  आई,
आँचल   से  ढँक   लेती  माई।


धूप  आँख  जब  दिखलाता है,
आँचल   छाता  बन  जाता  है।


थककर  गोदी   में जब पड़ता,
माँ  का आँचल  पंखा झलता।


दूध पिलाती   मुझको  माँ जब,
आँचल   बनता   मर्यादा  तब।


खटिया , तकिया   और रजाई,
माँ का आँचल सब  कुछ भाई।


माँ  का  गुस्सा  हो   जब   हाई,
आँचल  कसकर   करे  कुटाई।





2

              मच्छर

भन-भन करते मच्छर आया,
पूरे  घर  में    उघम   मचाया।

इसको   काटा उसको काटा,
धीरे-धीरे      सबको   काटा।

बदन   दर्द   फिर  ठंडी लेकर,
आया सबको इक दिन फीवर।

काँप   रहे   थे   मुनिया  मोनू ,
दादी    दादा    सोनी    सोनू।

सब  अस्पताल आये झटपट,
हुआ   शुरू ईलाज फटाफट।

मलेरिया   था  सबको आया,
डाक्टर   ने सबको समझाया।

साफ   रहे घर का हर कोना,
मच्छर   दानी  में  ही   सोना।

हेमंत कुमार "अगम"
भाटापारा छत्तीसगढ़











Tuesday, 16 July 2024

झोपड़ी और बरसात

रोते-रोते    झोपड़ी    ,   जागी  पूरी रात।
आफत ही तो आ गई, खूब  हुई बरसात।।

महलों में  चमका   गई , वर्षा   अपना नूर।
धनिकों के प्याले भरे   , बारिश के अंगूर।।
वर्षा    यूँ   देती  रही  , महलों को सौगात।
इधर  गरीबी  ने सहे , बारिश के आघात।।
रोते-रोते   झोपड़ी    ,  जागी   पूरी   रात।
आफत ही तो आ गई, खूब  हुई बरसात।।


मद में मस्त पलंग था, भीग रहा था खाट।
पर्स  मियाँ छतरी लिए , घूम रहा था हाट।।
महलों  ने  फोटो  लिए , वर्षा सँग इफरात।
किस्मत छप्पर का उड़ा , जैसे कोई पात।।
रोते-रोते     झोपड़ी ,   जागी    पूरी   रात।
आफत ही तो आ गई, खूब  हुई बरसात।।

सहमा  सा छप्पर रहा, पकड़े-पकड़े बाँस।
बारिश  इतनी  निर्दयी, लेती एक न श्वाँस।
मिट्टी, गारे कब तलक, सहे   मेघ   प्रपात।
लड़ते-लड़ते नींव ने , माना आखिर मात।।
रोते-रोते     झोपड़ी ,   जागी    पूरी  रात।
आफत ही तो आ गई, खूब  हुई बरसात।।


डगमग-डगमग झोपड़ी, करते गिरी धड़ाम।
हड्डी टूटी , सिर फटा , पल में  काम तमाम।।
चौका, बर्तन दब  गए, करुण हुए  हालात।
पर महलों ने की नहीं, दया  धर्म  की बात।।
रोते-रोते   झोपड़ी    ,   जागी   पूरी   रात।
आफत ही तो आ गई, खूब  हुई  बरसात।।


हेमंत कुमार "अगम"
भाटापारा छत्तीसगढ़
7000953817

Thursday, 27 June 2024

ज्ञान परख दोहे

1
मीठे का सेवन सदा,रहा विषय का भोग।
नीम लगे कड़वा बहुत,पर वह साधे रोग।।

2
तोता  इस  संसार  में ,बिरला समझे श्वाँस।
पिंजरे भर उड़ता फिरे,बाँध मोह का फाँस।।

3
मन जुगनू यह सोचता,मुझमें अतुल प्रकाश।
दादुर को  जैसे लगे , कूप  सकल आकाश।।

4
जंगल सारे काटकर,खत्म किये सब ठाँव।
लिये कुठारी आप ही,काटे अपने पाँव।।

5
मन में विष की कोठरी,मुख में लिए मिठास।
एसे जन की दोसती ,  दमड़ी  बचे  न  मास।।

6
सारे  अपने पाप को  , धोने  निकला  श्वान।
भौं-भौं में रसता कटा , हटा तिरथ से ध्यान।।

7
मन में बातें और है,मुख में बातें और।
एसे लोगों को कभी,बाँधें ना सिर मौर।।

8
 तोता रटना छोड़ दे,दे मौलिक पर ध्यान।
वर्ना  संकट  में   धरा, रह  जाएगा  ज्ञान।।

9
कोयल जैसी निर्दयी, और भला है कौन।
कागा के घर छोड़ती,अपनी संतति मौन।।

10
चिपके जिस पर चूस ले,मर्यादा धन प्रान।
कामी क्रोधी लालची , ये  हैं जोंक समान।।

11
सुख   सारे  जो बाँट दे,दुख  झेले खुद आप।
गलता  ढलता  लौह  सा , होते  हैं  ये   बाप।।

12
पालें कुत्ता बे-हिचक,पर रख इतना ध्यान।
आगे   ना  माँ-बाप से , हो जाये वह श्वान।।

13
सब कुछ कड़वा नीम का,पर गुण का भंडार।
जैसै   बापू    डाँट  कर  , करे  पूत  से प्यार।।

14
शांत  भाव  अरु  चित्त से,ज्ञानी करै विचार।
जैसे   पीछे   बाघ के  ,  आवै चतुर सियार।।

15
सोवत   जागत चित्त को , डसता साहूकार।
सोंच समझ कर माँगना, कोई कभी उधार।।

16
रंग   बदलने  में  कहाँ , करता  है  परहेज।
गिरगिट से भी आदमी,निकल गया है तेज।।

17
पानी  जब  बहता रहा ,ना समझा कुछ मोल।
पानी-पानी   हो गया  , तब समझा अनमोल।।

18

सत्य सत्य कहता फिरे, किया कभी है  गौर।
सतयुग  में भी सत्य का, नही  रहा था  ठौर।।

19
दिल से दिल का जोड़ना,एक बड़ा व्यापार।
तौल नफा नुकसान को,करते हैं अब प्यार।।

20
साधू  नेता   आमजन ,देख  लार  टपकाय।
रुपया   ऐसी   सुंदरी  ,चाहँय सभी बिहाय।।

21
सोच सोच का फर्क है,चीज वही है एक।
मोहन को अच्छा  लगे,सोहन मारे फेंक।।

22
जेवन  पानी  पवन  से, जीवित रहै शरीर।
आतम जीमै ज्ञान जब ,मिटै जनम जंजीर।।
23
हद से ज्यादा प्रेम भी,होवय जहर समान।
मादा बिच्छू प्रेम कर,लेवय नर का जान।।
24,
कुटिल जन और संत को ,समझें धरकर धीर।
दोनो   का  स्वभाव अति  , होवत  है  गंभीर।।

25
त्याग सभी आलस्य को,लेकर प्रभु का नाम।
सोये-सोये  से  नही  ,  बनता   है कुछ काम।।

26
लालच के आगोश में,कीट समझ ना पाय।
घटपर्णी  के  कुंड में, डूब   मरै  सड़ जाय।।

27
मा-बापू की सीख  को,धारै जो संतान।
कष्ट  उसे छूवै  नही,पावै अति सम्मान।।
28

विद्या   रूपी   कुंड में , उतरै   जो   इंसान।
घड़ा भरै निज ज्ञान का,पीवै सकल जहान।।

29
ज्ञान  मिले  से  दंभ का,होता है अवतार।
बिन गुरुवर के ज्ञान भी,होते खरपतवार।।


30
काँव-काँव कागा करे,होवै जन परेशान
शांत मूक गंभीर तो,होवय संत सुजान।

31
सत्य अहिंसा छोड़कर,करे कुसंगति पान।
मरा  हुआ  है  आदमी,या  है  वह  शैतान।।


33
पात्र  कृपा  का  ना बनें ,कृपा भीख के तुल्य।
परिश्रम और दिमाग से, बढता खुद का मूल्य।।

34
पुण्य काम कर   दीजिए,जीवन को सद्अर्थ।
दान   कीजिए  ज्ञान का , यदि हैं आप समर्थ।।

35

जिसको कुछ आता नही,''करते काम  तमाम''।
पर  जो  जहाँ   समर्थ  है,नेक करे सब काम।।

36
पूरी   दुनिया  देख  के ,जान  गया  इक बात।
पैसा  है  तो   संग  सब , वरना   मारे   लात।। 

37

कभी  क्रोध का वेग भी , देवै  अतुल अमोद।
जैसे  गरजै  और  फिर  ,वर्षा   करै   पयोद।।

38
वर्षा  से  तन  भीगता , मन  भीगै सँग मीत।
जो भीगै  गुरुनाम सँग,भीगै  तन-मन प्रीत।।
39

मुख में जिनके राम है,मन में आशाराम।
ऐसे   धोखे  बाज से ,राम  बचाये  राम।।

40
बीमारी   से  तन    गले ,  और  जाय सम्मान।
जिस घर शौचालय नही,वो घर नरक समान।।
41
जो  रामों  का  राम  है  , जो  धामों का धाम ।
है  बस  केवल  एक ही ,'माँ' है उसका  नाम।।
42
तन पर नही गुमान कर,होगा इक दिन राख।
करनी संग सुधार ले  , अपनी कड़वी  भाख।।
43
तंत्र मंत्र का चल रहा,यहाँ खेल पे खेल।
अनपढ़ बुद्धी ठीक है,पढ़े लिखे भी फेल।।
44
आफत ही तो आ गई,खूब हुई बरसात।
रोती  रोती   झोपड़ी  , जागी  पूरी रात।।
45
जले  प्रेम सौहार्द्र का  , दीपक जहाँ अनेक।
हिन्दू-मुस्लिम से अलग,चाँद  बनाओ एक।।

46
काम-महल   की  देहरी  ,जैसे  एक सराय।
रुकना चाहे रात सब,दिन मुख नही दिखाय।।
47
एक   दूजे को मारकर , खाते  सारे  जीव।
शाकाहारी भोज्य भी,तो क्या नही सजीव।।
48
रोने   से   होगा    नही  ,कठिनाई  का अंत।
सोंच समझ कर काम में ,लग जाओ हेमंत।।
49
कोयल  मीठी  बोल के ,  करे प्रेम आघात।
कड़वा पर सच बोल के , कागा खाये लात।।

50
प्रेम नही जिस घर मिले,मिले नही सम्मान।।
ऐसे  घर    ना जाइये, वो घर नरक समान।


हेमंत कुमार "अगम"
भाटापारा छत्तीसगढ़





Sunday, 26 May 2024

गर्मी


नदियाँ   नाले  ताल के , बिगड़ गये  हैं ताल।

बरस  रहे  हैं धूप जी , बनकर   जैसे  काल।।


सूरज  के आक्रोश   से ,  है  घड़ा   परेशान।

एसी  कूलर  फ्रीज की, निकल गई है जान।।


पशु -पक्षी अरु जानवर,क्या मानव की जात।

भुट्टे   जैसे भुन रहे  , पड़-पड़-पड़  दिन-रात।।


गर   जाना  हो  स्वर्ग तो , बाहर निकलो यार।

लू  गलियों   में  घुम  रहा , लिये मौत  उपहार।।

 
जगह जगह अवरक्त  का , अनदेखा है धार।

सड़कें  नागिन  रूप धर ,रोज रहीं फुफकार।।


गरमी  से  अकबक हवा ,खोजे शीतल छाँव।

नही  मिला ! पर एक भी ,तरुवर वाला गाँव।।


न   मानेंगे   बिना  पिये , सूर्य  देव अब खून।

माई-माई   में    मई  ,  और    कटेंगे   जून।।


हेमंत कुमार "अगम"

भाटापारा छत्तीसगढ़













Sunday, 5 May 2024

चुनाव

क्या समाज ने लोभ का,पहन लिया है खाल।

अब तो 'बंदर-बांट' कर  , सभी  उड़ाते  माल।।


ये  समाज है फल अगर , नेता  जी  हैं  बीज।

दोनों  को   ही   चाहिए , एक्स्ट्रा वाला चीज।।


नेता  बगुला  सा  बना , चले  चाल  पर चाल।

मीन कहाँ समझे भला  ,मुफ्त माल का जाल।।


दीन-हीन अश्पृश्य जन,  मन  में  करें विचार।

जाति,धर्म का खेल ही  ,  नेता   का  व्यापार!।।


जो  हो   झूठा   आदमी  , करे स्वार्थ की बात।

एसों   को  पहचान कर ,मारें 'मत' की लात।।


सब अवगुण को त्याग कर ,करे  देश  से प्यार।

एसे   नेता    खोजकर  , भारें   भारत   भार।।


हेमंत कुमार "अगम"

भाटापारा