Monday, 23 January 2017

ग़ज़ल

२२१२/२२१२/२२१२

मै तो हवा हूँ मेरा कोई घर नही,

मेरी रवानी है मेरा कोई घर नही।

उड़कर चलूँ मै आसमाँ ये चाह है,

पर बेटी हूँ मेरा तो कोई पर नही।

तूफाँनो से वो खूब खेला करती है,

क्या ताक पे रख्खे दिया को डर नही?

मेरे हवाले भी करो कोई सहर,

इन आँखो को अंधेरे की आदत नही।

मुझमे ही खोता जा रहा हूँ वक्त-दर,

अब निकलने का हौसला बाहर नही।

देखो ये सूरज चढ़ गया है ताक पर,

है पास कोई भी अभी बरगद नही।

ग़ज़ल

हेमंत कुमार मानिकपुरी

भाटापारा छत्तीसगढ़

















Saturday, 21 January 2017

ग़ज़ल

212/212/212/212

भीड़ मे मै अकेला ही चलता रहा,

हम सफर मेरा कोई ना साया रहा।

मेरे अपने कभी साथ थे ही नही,

उम्र भर अपने घर मे तन्हा रहा।

जा के देखा है बाजार मे मैने भी,

पैसों के आगे ईमान बिकता रहा।

साथ देने का वादा किया उसने था,

और वो दुश्मनी ही निभाता रहा।

कैसी ये उलझनो का बुरा दौर था,

पानी थी सामने और प्यासा रहा।

ग़ज़ल
हेमंत कुमार मानिकपुरी
भाटापारा



Friday, 20 January 2017

ग़ज़ल

122/122/122/122

मै खुद से बहुत दूर रहने लगा हूँ,
मै हर रोज सूरज सा ढलने लगा हूँ।

कभी था बसेरा मेरा भी गुलों मे,
मै पतझड़ के पत्तों सा झड़ने लगा हूँ।

दिवारें बना दी गई मेरे घर मे,
मै कैदी के जैसा ही रहने लगा हूँ।

ये मेरा शहर था नही लगता है अब,
मै फिर गाँव का सख्स लगने लगा हूँ।

सफर खत्म होने लगा है मेरा हर,
मै सागर के लहरों मे मिलने लगा हूँ।

ग़ज़ल

हेमन्त कुमार मानिकपुरी

भाटापारा








Wednesday, 18 January 2017

कविता

खलिहानो के रूप अनुपम,
नव वधु सा खिला है चितवन,
मेढ़ों पर डाल पवन संग झूमें,
खग गुंजन से भरा है उपवन।

झांकती अंबर से सूर्य किरणें,
रक्ताभ ऊन के गोलों सा दिखता,
देख रहा तरूणवर के ह्रिदय तल से,
अपना झिलमिल सुन्दर चितवन।

धरती ठंड से कांप रही है,
ओस के बूंदो से पत्ते हैं चरमर,
कानन मानो धू धू जल उठा है,
धुआं धुआं है अम्बर का तल।

श्वेत वस्त्र सा दिख रहा है ,
पर्वतों पर हिम का वृहद फैलाव,
झर झर गिरते झरने दिखते,
झुमर हो जैसे वृहद भाल पर।

इठलाती बलखती बेलें तरू पर,
बालों के लट सा अनुपम बिखरा है,
कोमल हरित तृण मखमल हो जैसा,
सज रही धरा बन यौवना चंचल।

रचना
हेमंत कुमार मानिकपुरी
भाटापारा
8871805078










Sunday, 15 January 2017

ग़ज़ल

2212/2212/2212

अक्सर मै फूलों को बचाया करता हूँ,

कांटो से मै खुद को सजाया करता हूँ।

इन मन्दिरों मे मस्जिदों मे जाना क्या,

कुछ भूखे बच्चों को खिलाया करता हूँ।

हँस्ता बहुत हूँ पर तुने जाना नही,

मै रात भर छुप छुप के रोया करता हूँ।

आना शहर मुझसे कभी मिलने जरा,

मै सब को आईना दिखाया करता हूँ।

मै प्यार मे जीता करूं ! चाहत नही,

मै प्यार मे सब हार जाया करता हूँ।

गजल
हेमंत कुमार मानिकपुरी
भाटापारा













Friday, 13 January 2017

ग़ज़ल

२१२/२१२/२१२/२१२

गैरों की बात मुझको तो करना नही,

जब ये साया मेरा होता अपना नही।

पांव तो हैं बेशक इस जमी पे मगर,

जिंदगी भर यहां तो है रूकना नही।

रोक लेता मगर जानता था उसे,

वक्त भी तो कभी साथ ठहरा नही।

मेरी दादी कहा करती थी बात जो,

ठोकरें खा के भी मैने समझा नही।

भूल जाना कभी था ये घर अब कहाँ,

ये महज मिट्टी हैं जो गिराया नही।

बस ये आखिर मे दो गज जगह है मेरा,

और अब कोई भी तो ठिकाना नही।

ग़ज़ल
हेमंत कुमार मानिकपुरी
भाटापारा
छत्तीसगढ़

कविता

ददा के दुलार  पातेंव,
दाई के दुलार  पातेंव,
बेटी  अंव त का भईगे,
मया के संसार पातेंव।

मोरो तो मन होथे,
चुरगुन बन उड़ जातेंव,
पिंजरा झन होतिस कोनो,
खुल्ला में अगास पातेंव  ।


मोरो हवय सपना,
पढतेंव इस्कूल कालेज,
बेटा असन महूं ददा,
जघा जघा नाव कमातेंव।

झन करहू जल्दी बिहाव,
पहिली मोला सिरजाव,
देखन दव दुनिया दारी,
जियें के मे रद्दा पातेंव।

आवन दव मोला तुमन,
झन मारव कोंख म जी,
बेटी बेटा एके खून,
दुनो म झन अंतर पातेंव।

ताना झन कोनी कसतिस,
मोर विधवा के मान होतिस,
संग समाज के रसदा म,
हांथ आघू आघू महूं लमातेंव ।

सुघ्घर जिनगी होतिस,
सास ससुर देवर होतिस,
जरतिस झन जिंहा बहू,
अईसे मय ससुरार पातेंव।

रचना
हेमंत कुमार मानिकपुरी
भाटापारा

Wednesday, 11 January 2017

ग़ज़ल

१२२/१२२/१२२/१२२

दिवाना अभी कोई घायल दिखा है,
मुहब्बत मे फिर कोई पागल दिखा है।

मुझे रहने दो इन किनारों पे आकर,
बड़ी मुद्दतों बाद साहिल दिखा है।

तमाशा है तेरा या कोई सजा है,
मरी फस्लें तब जाके बादल दिखा है।

मै अपनी हरम रख दिया हूं वहां पर,
जहां सांपों से लिपटा संदल दिखा है।

शहर की हवा मतलबी हो गई है,
हरिक सम्त मे कोई गाफ़िल दिखा है।

ग़ज़ल
हेमंत कुमार मानिकपुरी
भाटापारा