लाल टमाटर जब हुआ ,सोने से भी गोल्ड।
हरी भरी तरकारियाँ , हुईं धड़ाधड़ बोल्ड।।
बैंगन बुआ पिचक गईं , खोया गोभी रंग।
कद्दू , सेमी , ढेंस भी , दिखते हैं बे-रंग।।
ताजी-ताजी नकचढ़ी, जो थीं कल तक सोल्ड।
हरी - भरी तरकारियाँ , हुईं धड़ाधड़ बोल्ड।।
बिना टमाटर के नही , बनता कोई झोल।
झोला मियाँ उदास हैं ,बचा नही अब रोल।।
स्टाईलिश भिन्डी हुई , देहाती बन फोल्ड।
हरी - भरी तरकारियाँ , हुईं धड़ाधड़ बोल्ड।।
गुमसुम अलसाई पड़ी , लौकी , तोरी , ग्वाँर।
आलू , टिन्डा , बीन्स की , टेस्ट हुई बेकार।।
मुनगा जी की नाक को ,लगा रोग अब कोल्ड।
हरी - भरी तरकारियाँ , हुईं धड़ाधड़ बोल्ड।।
पड़ा करेला सोंच में , कटहल हुआ डिरेल।
चला गया मशरूम का , हाई -फाई खेल।।
अरबी जी फिसले पड़े ,परवल दिखता ओल्ड।
हरी - भरी तरकारियाँ , हुईं धड़ाधड़ बोल्ड।।
बेचारी भाजी कहाँ , लागे हैं अब फ्रेश।
पालक , चवलाई हुईं , साहब देखो क्रेश।।
जीवन के बाजार में ,जैसे सब कुछ होल्ड।
हरी -भरी तरकारियाँ , हुईं धड़ाधड़ बोल्ड।।
लाल टमाटर जब हुआ ,सोने से भी गोल्ड।
रचना
हेमंत कुमार "अगम"
भाटापारा छत्तीसगढ़