लालच से पैदा हुआ ,आफिस है घर-बार।
तेज धार का मैं छुरा ,नाम है भ्रष्टाचार।।
अधिकारी रिश्वत कहे,दुल्हा जी उपहार।
लाला जी का ब्याज हूँ,चपरासी का प्यार।।
टेबल के नीचे कभी,कभी प्रसाधन कक्ष।
नोट बड़े आराम से , लेने में हूँ दक्ष।।
कभी सगुन के वक्त में,या अटके जब काम।
लोग बड़े अरमान से , लेते मेरा नाम ।।
जो दे वो हो कर्ज में,और घिरे अवसाद।
लेने वाला प्रेम से , कहता मुझे प्रसाद।।
करतब मेरा देख के , दुनिया रहती दंग।
अनुकूलन मुझमें बड़ा,ढल जाता हर रंग।।
सोने चाँदी का महल ,रुपयों की है सेज।
फिर भी शोषण से मुझे, रहता नही गुरेज ।।
झूठ- कपट की खाद से ,बढ़ता सालों-साल।
मुझे तनिक भी ना पचे ,सच्चाई का माल।।
हेमंत कुमार "अगम"
भाटापारा-छत्तीसगढ़