Saturday, 18 October 2025

गांव


गांव

कुछ गांव
शहर में
पहुंच चुके हैं
गांव को छोड़कर
कुछ गांव निकल रहे हैं
शहर की ओर
गांव छोड़कर
कुछ गांव फुसफुसा रहें हैं
शहर और गांव के बीच
कुछ गांव बैठे हैं
शाम को
अपने -अपने गांव में
बड़े ही शुकून के साथ
और गप्पे लड़ा रहें हैं....

हेमंत कुमार "अगम"
भाटापारा छत्तीसगढ़ 

दीपावली


दीपावली 

बुधरी के घर भी हर साल 
दीप जलता है
दीपावली पर
पूरा गांव दीप जलाता है
इस लिए वह भी
जलाता है
पूरा गांव दीपावली के दिन
अपने वैभव का
सत्कार करता है
खील बताशे मिठाइयां 
और भी न जाने
क्या क्या व्यंजन
दीप को अर्पित किये जाते हैं
पूरा गांव दीपावली पर
तेल के दिये की रौशनी से
मानो नहा उठता है
पूरा गांव उस दिन
अद्भुत व्यंजनों का
रात भर लुत्फ उठाता है
पर बुधरी और उसकी बाई को
दीपावली के कुछ दियों को 
रौशन करने के लिए
अपने भूख को
बिना खाये-पिये ही
सुलाना पड़ता है...

हेमंत कुमार "अगम"
भाटापारा छत्तीसगढ़ 





Monday, 13 October 2025

शब्द मेरी चेतना

मैं विस्थापित कर देना चाहता हूं
अपने आप से
स्थापित शब्द
ये स्थापित शब्द
मुझे मेरी चेतना से
अलग कर देते है
स्थापित शब्द अपने विचारों को
मेरी आत्मा में
केवल और केवल
लादना चाहते है
मैं किसी स्थापित शब्द के
दृष्टिकोण से सोचकर
उस सोच के साथ
अपना स्थापित सोच 
नहीं बना सकता
और क्यों बनाऊं ?
मै भी उस बादल को
महसूसना चाहता हूं
जो रात के अंधेरे में
पत्तियों पर ओस की बूंदें छोड़ जाता है
मैं उस नदी के साथ
बहकर जानना चाहता हूं
नदी का संघर्ष 
मैं उस पर्वत से मिलना चाहता हूं
जिसका विशाल शरीर ऊपर पहुंचते-पहुंचते 
एक सुई के नोक जैसा हो जाता है
मैं कोलतार की सड़कों पर
भरी दोपहरी में
नंगे पांव चलना चाहता हूं
और सुनना चाहता हूं
जलती हुई सड़कों पर
गरीबी के गीत
मैं महुआ बिनती स्त्री को
उसके पांव से लेकर उसके घर तक
सूंघना चाहता हूं
मैं साइकिल और खटिया से
ढोई जा रही लाशों के गांवों को
तथाकथित आधुनिक सभ्यता में
खोजना चाहता हूं
पर उन
स्थापित शब्दों के साथ नहीं
जहां मेरे शब्दों की मौलिकता 
खत्म हो जाती है
वरन उन शब्दों के साथ
जो शब्द मुझे 
मेरी आत्मा से बात करने दे!!

हेमंत कुमार "अगम"
भाटापारा छत्तीसगढ़ 














Saturday, 11 October 2025

पूरा घर

आज चूल्हा बहुत खुश है
खुश इतना कि
पहले से ही उसने
उपले और लकड़ियों को
अपने पास में 
इकठ्ठा कर लिया है
और घर के डेकचियों को
फुसफुसा आया है
कि आज तुझमें दाल बनेंगे
और तुझमें भात 
कड़ाही से भी कह आया है
देखना आज तुझमें
कोई न कोई तरी वाला चटपटा
साग बनेगा
घर की दीवारें उछल-उछल कह रहे हैं
इस बार जरूर छुही के साथ
हम भी
टेहर्रा रंग से पोते जाएंगे
पैरा की छप्परें-
खपरैलों का संसार देखने लगी है
घर से लगा कोठार
पहले से ही जीमीकंद का डंठल
खीरा, तोरई ,फूट और
बरबट्टी के सूखे नारों को काट कर
बिलकुल दुल्हे की तरह सज गया है
और पल -पल
बैलगाड़ी का इंतजार किया जा रहा है 
पर जब तिहारू
खेत से घर आया
पसीने से तर - बतर था
सिर पर बंधे हुए सफेद गमछा को
निकाला और 
घर की आंट पर  हताश बैठ गया
इस बार भी धान की फसल
हर बार की तरह
खेत में ही नाप लिए गये थे
तिहारू खेत से
खाली हाथ घर लौटा था
कोठार से लेकर पूरा घर
तिहारू को देखकर
भौंचक्का रह गया
घर को समझने में देर न लगा
और झट ही
उस घर से एक बहुत बूढ़ा घर निकला
तिहारू को गले लगाते हुए बोला
कोई बात नहीं बेटा
तुमने बहुत मेहनत की
इस बार भी....
ये कथन सुनते ही
तिहारू के संग पूरा घर
एक बार फिर 
भूख और इच्छाओं को भूलकर
खुशी से झूम उठा....

हेमंत कुमार 'अगम'
भाटापारा छत्तीसगढ़

Thursday, 9 October 2025

चुपु -चुपु, पुइयों -पुइयों


चुपु-चुपु ,पुइयों-पुइयों



चुपु-चुपु ,पुइयों-पुइयों
की आवाज वाली
सेंडल पहनी
एक लड़की 
मुझे गली से रोज
देखती है
महज डेढ़ बरस की होगी
वो रोज दौड़ लगाती है
हमारी गली में
पड़ौस में ही रहती है
अभी-अभी चलना सीखा है
अक्सर गेट के पास आ जाती है
झुककर देखती है 
शायद मुझे ही देखती है
और जब मैं उसे देख लेता हूं
अपनी बंधी हुई मुठ्ठी से 
एक ऊंगली निकाल कर
मिठ्ठू की चोंच जैसे
ऊपर नीचे हिलाने लगता हूं
वो भी करने की
कोशिश करती है
और हंसने लग जाती है
मैं भी हंसता हूं
मुझे हंसता देख वह
जोर-जोर से
कूदने लगती है
और चुपु-चुपु, पुइयों-पुइयों 
वाली सेंडल की आवाज से
पूरा घर 
कुछ समय के लिए ही सही
बचपन की तरफ
लौट आता है....

हेमंत कुमार "अगम"
भाटापारा छत्तीसगढ़ 





Tuesday, 30 September 2025

मैं फिर आऊंगा

मैं फिर आऊंगा 


बसंत ने आना नहीं छोड़ा है...
अभी भी
वह किसी तरह
अपनी तय सीमा में 
पहुंच ही जाता है
खिलखिता ,गुनगुनाता,नाचता हुआ
और आता है तो
मदमस्त आता है
सबके लिए ...
वह जब आता है
हवाएं लिपट जाती हैं उससे
फूल खिलने लगते हैं
तितलियां,भौंरे और मधुमक्खियां
उस लय और ताल में
थिरकने लगती हैं
पलास दहक उठता है
सेमल अपनी फूलों के साथ
'सांकृत्यायन' को ही मानो
अपनी यात्राओं का
वृतांत सुनाने लग जाती हैं
महुआ का पेड़ 
अपने गोड़ीं रिवाज में
अर्ध्य समर्पित करने लग जाता है
गुलमोहर के फ्लेम
कोलतार की सड़कों पर
शीतलता बिखेरने लग जातीं हैं
आम का बौर
अपनी सारी प्रेम कहानियां 
अमराई को सुनाने लग जाता है
नदियां अपने बीच आए 
पत्थरों के साथ
लय,ताल और सुर मिलाने लग जातीं है
तीतर, बटेर ,मोर
और न जाने कितने
अपनी पीढ़ी को
बसंत के साथ रोपने लग जाते हैं
आने वाले बसंत के लिए
पर बसंत इस बार
हर बार की तरह
खुश तो है मगर
उदास भी है
वह इस बार भी
बार-बार की तरह
गांव से होकर
शहर की बड़ी-बड़ी
अट्टालिकाओं के साथ भी
गीत गाना चाहता है
नाचना चाहता है
और इस हेतु
वह गया भी था
बड़ी ऊंची दीवारों के सहारे
पर अट्टालिकाओं की खिड़कियों नें
उनके तरफ देखा तक नहीं...
उसने खिड़कियों की तरफ
मुस्कुराकर देखते हुए कहा
खैर कोई बात नहीं!
मैं फिर आऊंगा
पर
बसंत अब लौट जाना चाहता है
पूरे साल भर के लिए....

हेमंत कुमार 'अगम'
भाटापारा छत्तीसगढ़ 








Thursday, 25 September 2025

आठ सौ स्क्वेयर फूट

आठ सौ स्क्वेयर फूट


घर वास्तव में
प्रेम और आवश्यकताओं का
एक गतिशील समूह है
प्रेम भी अनंत है
और आवश्यकताएं भी अनंत है
परंतु घर में 
परिश्रम अनंत नहीं है
इस लिए घर 
हमेशा उलझता और सुलझता हुआ
घर रहता है
कभी दीवारें दरकती हैं
कभी छत टपकता है
कभी पेंट भरभराता है
कभी दरवाजे का कें-कें, रें -रें 
बच्चों का ट्यूशन 
कालेज की फीस
हास्टल का चार्ज
घर का राशन
बिजली का बिल 
मां की दवाई...
इन सब का सामंजस्य 
हमेशा उलझा हुआ रहता है
प्रेम के ताने-बाने के संग
इस लिए 
आठ सौ स्क्वेयर फूट का घर भी
बहुत बड़ा घर होता है
इतना बड़ा कि
पूरे तीस दिन की सैलरी
पन्द्रह दिन में हांफ जाती है....

हेमंत कुमार 'अगम'
भाटापारा छत्तीसगढ़ 











Tuesday, 23 September 2025

वृद्धावस्था



"वृद्धावस्था "


मैं अब उस दौर में हूं 
कि चलने को भी
ठहरना कहना पड़ रहा है
त्वरण जैसे लुप्त हो गया है
गति के सारे नियम
अब मिथ्या जान पड़ते है
जीवन और मृत्यु के बीच
बिलकुल सापेक्ष हो गया हूं
फेफड़े विसरण तो करते हैं
पर रुधिर आक्सीजन को 
समेट नहीं पा रहा है
न्यूरान्स और न्यूरोग्लिया 
अपनी सेवाएं देकर
सेवानिवृत्ति की ओर
बढ़ रहे है
संचेतना अक्रिय गैसों की तरह
अष्टक प्राप्त कर चुकी है
ग्रंथियों ने शिथिलता 
जाहिर कर दिया है
माइटोकांड्रिया ग्लूकोज के साथ
लुका-छिपी खेलने लगा है
कोलेजन और इलास्टिन ने
कोशिकाओं से प्रेम करना बंद कर दिया है
पाइरुइक एसीड टखनों में जाकर
लेक्टिक एसीड में
बदलने लगा है
अवतल, उत्तल को आंखों ने
समझना बंद कर दिया है
शरीर का परिमाण 
अंतिम परिणाम तक 
पहुंचने लगा है
उत्प्रेरकों नें साथ छोड़ दिया है
धीरे -धीरे सारी अभिक्रियाएं 
बंद हो रही है
अब ऐसा लगने लगा है
किसी भी क्षण
ये सारी अभिक्रियाएं बंद हो जाएंगी...

हेमंत कुमार 'अगम'
भाटापारा छत्तीसगढ़ 






स्त्री

स्त्रियां नदी की तरह होती है
उनमें तरलता होती हैं
बहाव होता है
इस लिए स्त्रियां 
प्रेम को बहा सकतीं हैं
खुशबू की तरह फैला सकती हैं
कभी मां बनकर
कभी बहन बनकर
कभी दोस्त बनकर
स्त्रियां-प्रेम का मूर्त रूप होती हैं
पुरुष समुद्र की तरह होते हैं
नमकीन और कठोर
शायद सतत संघर्ष ने पुरुषों को
कठोर और सख्त बना दिया है
स्त्रियों की तरह उनमें लचीलापन नहीं है 
इसका यह मतलब भी नहीं है
कि पुरुष में प्रेम नहीं होता
पुरुष में भी प्रेम होता है
पर ! पुरुष के प्रेम में बहाव नहीं होता
ठहराव होता है
वह अपने प्रेम के पास
अमूक होकर ठहर जाता है
उसका ठहरना ही
प्रेम का प्राकट्य है
प्रेम के मामले में
असल में पुरुष ,एक स्त्री है
क्यों कि स्त्री के मूल में ही
प्रेम है
ये अलग बात है
पुरुष का पुरुष होना
सबको दिखाई देता है
पर,पुरुष का स्त्री होना 
किसी को दिखाई नही देता......

हेमंत कुमार 'अगम'
भाटापारा छत्तीसगढ़ 










Tuesday, 16 September 2025

बसंत के मौसम में जब उस पेड़ से मिला....

बसंत के मौसम में
जब उस पेड़ से मिला...

बसंत के मौसम में
जब उस पेड़ से मिला 
वो खड़ा था चुपचाप
फूलों से लदा 
हवाएंँ सरसराकर आतीं थीं
और लहराकर 
उनके फूलों से लिपटकर
खुशबु चुराकर भाग जातीं थीं
फूल भी हवाओं के साथ
दिन-रात झूलते और
लहराकर मदमस्त हो जाते
तितलियांँ ,भौंरे कई तरह के पक्षी 
उन फूलों पर जान छिड़कते
कुछ पक्षी तो उस पेड़ पर
फूलों के साथ 
दिन-रात बिताने लगे थे
सब प्रेम में मग्न थे
पर वह पेड़ चुपचाप उदास खड़ा रहता था
न बसंत की हवाओं को 
उनसे कोई मतलब था
न फूलों को न तितलियों को न पक्षियों को
पेड़ मुझसे कह रहा था
वैसे तो वो
बारह महीने अकेला ही रहता है
पर बसंत के इन तीन महीनों में
सबसे ज्यादा अकेला और 
सबसे ज्यादा उदास होता है....


हेमंत कुमार 'अगम'
भाटापारा छत्तीसगढ़

Tuesday, 9 September 2025

पितृपक्ष

'पितृ पक्ष'

पितृ पक्ष
मेरे लिए
खास होता है
खास इसलिए होता है कि
मैं बहुत कुछ
जानना चाहता हूं
अपने पितरों के 
इतिहास के बारे में
मेरे पास जो जानकारी है
दादा परदादा तक ही है
मैं
पर-परदादाओं को भी 
जानना चाहता हूं
पर खेद है!
उन मेरे वंशजों को
कोई माध्यम नहीं है
जानने का
कबीर पंथ में क्रिया कर्म
सब घर में ही हो जाते हैं
अतः लेख भी उपलब्ध नहीं हैं
खैर कोई बात नहीं!
मेरे मन में हमेशा कौतूहल रही है
कि, मेरे वंशज
किस तरह के मकानों में
रहते रहे होंगे
कि वे किस तरह के कपड़े पहनते
रहे होंगें
कि वे त्योहार किस तरह से 
मनाते रहे होंगें 
कि उनकी
सांस्कृतिक परंपराएं और
खान-पान 
किस तरह की रही होंगी
इत्यादि....
मुझे तर्पण करने में
कोई लगाव नहीं है
'बरा-सोंहारी' भी
नहीं 'खवाना' मुझे
ना छत पर
दाल-भात
फेंकना है 
अपने पितरों के लिए
रूढ़िवादी विचारों से
मेरा कोई सरोकार नहीं है
बस मैं तो
स्वस्थ मानसिकता और
स्वस्थ प्रेम से
उन्हें जानना चाहता हूं
उन्हें याद करना चाहता हूं
मैं पितृपक्ष का
सदैव आभारी रहूंगा 
जीवन के इस 
भाग-दौड़ में
अपने पूर्वजों को
जिन्हें हम भूल
गये होते हैं
उन्हे याद करने
उनका गौरव गान करने 
का एक मौका
यह पितृपक्ष 
देता है
यह पन्द्रह दिन 
मेरे लिए बहुत
असाधारण रहता है
मैं अपने होने को
उनमें तलाशता रहता हूं....

हेमंत कुमार 'अगम'
भाटापारा छत्तीसगढ़

Thursday, 4 September 2025

अंतिम पड़ाव

अंतिम पड़ाव

जिन चीजों से लगाव था
पहले कभी
जिसे पाने के लिए
मन
बावरा हुआ रहता था
आज वह सब चीजें
अचानक
निर्थक सी 
जान पड़ने लगीं है
मन अब 
संतुलन के बाहर
अचेतन अवस्था में
भ्रमण करने लगा है
चुपके-चुपके 
उम्र के
अंकों का गणित 
बढ़ते क्रम में
शून्य की ओर
बढ़ने लगा है
शिथिलता 
शरीर का अनिवार्य तत्व
हो गया है
मस्तिष्क के
अंतरिक्ष में
एक ब्लैक होल 
बन रहा है
जो स्मृतियों को
आहिस्ता-आहिस्ता निगल रहा है
शायद उसी का 
यह परिणाम है
अब मैं
दुनिया के संग-संग
खुद को भी
भूलने लगा हूं...

हेमंत कुमार 'अगम'
भाटापारा छत्तीसगढ़ 
'यह कविता मौलिक व अप्रकाशित है'

(उम्र के अंतिम पड़ाव में दादा जी के विचारों का काव्य रूपांतरण)

Wednesday, 3 September 2025

विद्रोह से पहले

विद्रोह से पहले



एक घर है
मेरे मुहल्ले में
मैं आते-जाते
रोज ही
उस घर को देखता हूं
मुझे और घर
आते-जाते
कभी-कभी दिखाई देते है
पर वह घर
रोज ही 
दिखाई देता है
इसलिए दिखाई देता है
कि उस घर के ऊपरी मंजिल में
एक खिड़की हमेशा खुली रहती है
और चूड़ियों से भरे हाथ
बाहर निकले हुए होते हैं
जो बाहर की रौशनी में
स्पष्ट दिखाई देता है
ऐसा लगता है उस घर में
उस कमरे की लाईट
रोज ही बंद रहती है
ध्यान से देखने पर दिखता है
कुछ घुंघराले काले बाल
और एक सिर
जो
खिड़की के जेल सरिखे छड़ों पर
 हमेशा टिका रहता है
आंख ऊपर किए
और
आकाश की तरफ देखता रहता है...

हेमंत कुमार 'अगम'
भाटापारा छत्तीसगढ़ 


Tuesday, 2 September 2025

वहम

मैं जब रात में 
तारों को देखता हूं
कितनाअच्छा लगता है
तारों का समूह
ऐसा लगता है
मानो एक दूसरे से
प्रेमबद्ध होकर
एक दूसरे के
ह्रदय में समा रहे हों
जैसे ...
ये एक दूसरे के लिए ही
बने हों
सारा आकाश
रात भर
तारों के आलिंगन से
भरा होता है
शुक्र है
मैं ये जानता हूं
यह एक वहम है
दूर से देखने पर
सब कुछ पास ही
दिखाई देता है....!!!

हेमंत कुमार "अगम"
भाटापारा छत्तीसगढ़ 

Sunday, 31 August 2025

मेरी मां

मां मुझे 
मेरे शरीर में
उठ रही तरंगों से
पहचान लेती है
आज मैं अड़तालीस का
हो गया हूं
और वह बहत्तर के करीब है
जब मैं घर में रहता हूं
मैं जिधर भी जाऊं 
इस कमरे से उस कमरे तक
या पोर्च तक जाऊं
या छत पर चढ़ जाऊं 
हर पल उसकी आंखें
मुझे तलाश करती रहतीं है
मां पल-पल मुझे संज्ञान में रखती है
वह बहरी भी हो गई है
पर मैं अगर धीरे से भी बोलूं 
वह तुरंत समझ जाती है
मेरे होंठ लपलपातें हैं
और उनकी धुंधली आंखें
मुझे झटपट पढ़ लेतीं हैं
कुछ समय ऐसा भी आता है
जब मैं और मां केवल रहते हैं
तब मैं देखता हूं
मां के हाथ पैरों में गजब का
फुर्तीलापन आ जाता है
बिन कहे वह सब जान लेती है
दाल भात सब्जियां 
उसके कांपते हाथों से
केवल मेरे पसंद की
बनने लगती है
स्कूल के लिए निकलूं तो 
मोटर साइकिल की चाबी 
रेन कोट, हेलमेट ,पेन
सब कुछ तैयार मिलता है
और मैं जब जाने लगूं 
मां मुझे दूर तक देखती है
मैं भी रुकता हूं
अपनी मां के लिए
दूर से ही सही एक पल के लिए 
मुड़कर देखता हूं
अपनी मां को
और अपने काम पर चला जाता हूं....

हेमंत कुमार 'अगम' 
भाटापारा छत्तीसगढ़ 






Wednesday, 27 August 2025

जंगल सत्याग्रह

जंगल सत्याग्रह

एक आम का पेड़, जंगल के बीचों-बीच रहता था। अंबू उसका नाम था।
सब पेड़ों से उसकी दोस्ती थी। पेड़ों से बातें करना, हँसना उसे अच्छा लगता था।
अंबू आम का पेड़ दूसरे पेड़ों के घर भी घूमने जाता था।
अंबू जब अपने पेड़ दोस्तों के घर जाता तो ताज़ा मीठा आम भी ले जाता और बड़े प्यार से अपने दोस्तों को खिलाता।
सभी दोस्त मीठे रसीले आम की प्रसंसा करते और अंबू मन ही मन ख़ुशी से झूम उठता।

जंगल के सारे दोस्त जब अपने दोस्तों के घर जाते, तो अपना मीठा फल भी ले जाते और अपना प्रेम जताते।
यह प्रेम कितना अच्छा था न!

जंगल के सारे पेड़ बहुत सारा फल मानवों और अन्य जीवों के लिए भी छोड़ देते थे और खुश होते थे।

एक दिन अंबू सो रहा था, तभी आवाज़ आई—खट-खट।
अंबू ने दरवाज़ा खोला तो देखा कि जंबू, जामुन का पेड़, हाँफ रहा है।
अंबू बोला—“अंदर आओ दोस्त।”
जंबू बोला—“न-न-न… आने का समय नहीं है।”
अंबू घबरा गया—“आख़िर क्या हुआ? बताओ न…”

जंबू बोला—“गाँव किनारे वाले जंगल काटे जा रहे हैं!
कई पेड़ मारे जा चुके हैं, नन्हे-मुन्ने पेड़ों को भी नहीं छोड़ा जा रहा है।”

अंबू डरते हुए बोला—“यह तो बहुत बुरा हो रहा है। क्या उन मानवों को यह मालूम नहीं कि हम पेड़ ही उन्हें फल, सब्ज़ियाँ, अन्न और प्राणदायी हवा देते हैं! और देखो उनकी नासमझी कि हमें ही काट रहे हैं।”

थोड़ी ही देर में यह बात जंगल में पेड़ों के बीच आग की तरह फैल गई।

उधर नदी किनारे से बबूल कटिला दौड़ता हुआ अपने दोस्तों के साथ अंबू के पास आ रहा था।
अंबू को देखते ही बबूल कटिला गुस्से से लाल होते हुए बोला—
“अंबू भाया! मैं उन सारे मानवों को अपने काँटों से छेद डालूँगा। बहुत कुछ सहन कर लिया है हमने। अब लड़ाई आर-पार की होगी।”

बबूल कटिला और उसके दोस्तों ने एक स्वर से चिल्लाया—
“हाँ-हाँ! आर या पार!”

पर अंबू आम और जंबू जामुन बहुत समझदार थे। उन्होंने बबूल कटिला को समझाकर शांत किया और शाम को सब पेड़ों की बैठक बुलाने की बात कही।

शाम को अंबू आम के घर के पास जंगल के सारे पेड़ों की बैठक शुरू हुई।
पीपलू दादा ने बोलना शुरू किया—
“यह सच है कि हम पेड़ों की वजह से ही मानव खुशहाल और जीवित है।
मानव तो बहुत समझदार प्राणी होते हैं, पर ऐसा वह क्यों करता है, यह समझ से बाहर है…?”

बबूल कटिला तपाक से बोल उठा—
“मैं तो कहता हूँ, आर या पार की लड़ाई लड़ी जाए। मैं अच्छी तरह जानता हूँ इन मानवों को। ये लातों के दुश्मन, बातों से नहीं मान सकते!”

सभी पेड़ों ने भी बबूल कटिला की बातों पर सहमति जताई।
सभी पेड़ों का मानना था कि अब बिना लड़े कोई बात बनने वाली नहीं है।

अंबू आम और जंबू जामुन को भी बबूल कटिला की बात बहुत हद तक सही लगी।
अंबू आम ने कहा—“जब सभी को यह विचार पसंद है, तो हम भी लड़ने के लिए तैयार हैं।”

बरगद मियाँ ने कहा—“अगर लड़नी ही है तो हम एक अनोखी लड़ाई लड़ेंगे, जो इन मानवों ने कभी लड़ी थी।
हम जंगल के सभी पेड़ जंगल सत्याग्रह की लड़ाई लड़ेंगे।”

“जंगल सत्याग्रह! जंगल सत्याग्रह!”—सभी अचरज में पड़ गए।

अंबू आम ने पूछा—“यह क्या होता है दादा जी?”

पीपलू दादा ने कहा—
“तो सुनो… सत्याग्रह बिना हिंसा किए विरोध करना है।
हम उपवास करेंगे। बिना खाए-पिए हम अपने आप को कष्ट देकर उन मानवों का विरोध करेंगे।
जब हम खाना-पीना छोड़ देंगे, तो हमारी पत्तियाँ मुरझा जाएँगी, फूल और फल बनना बंद हो जाएँगे, शाक-सब्ज़ियाँ सूख जाएँगी।
फल यह होगा कि मानव वायु और भोजन के लिए तरस जाएगा… तब उन्हें हमारी कीमत समझ आएगी।”

जंबू ने कहा—“ऐसे तो हम मर जाएँगे, दादा जी।”

तब दादा जी ने कहा—
“हमें केवल जीवित रहने के लिए ही भोजन करना है।
हमें ध्यान रखना होगा कि पत्तियाँ, फूल और फल सत्याग्रह तक हममें कभी न आने पाएँ।”

जंगल के सभी पेड़ों को यह बात समझ आई और सबने सत्याग्रह करने का फैसला ले लिया…

हेमंत कुमार 'अगम'
भाटापारा छत्तीसगढ़

Monday, 25 August 2025

भाई बहन

कुछ समय को
आत्मसात कर लेना चाहिए 
और उस समय को खासकर 
जिस समय के साथ
अक्सर लुका छिपी 
हम खेलते रहे
कभी वह समय
उस पाले में होता
कभी वह समय
इस पाले में होता
पर उस एक समय के बीच में 
बहुत सारा समय
नोक-झोंक लिए रहता था
और उस नोंक-झोंक के बीच
एक चांटा और गाली 
रहतीं थी
और उस चांटा और गाली के बीच
भाई बहन का
प्यार रहता था
कितना सच्चा था 
वह प्यार
जिसमें 
लड़ाइयां थीं नोंक-झोंक थी
पर एक दूसरे के लिए
मर मिटने का 
संकल्प भी था.....

हेमंत कुमार 'अगम'
भाटापारा छत्तीसगढ़ 

Sunday, 24 August 2025

खटर-खटर


खटर-खटर

लंबी चोंच वाली
चिड़िया आती है
और दिन भर करती है
खटर- खटर, खटर- खटर

जाने उस पेड़ पर
क्या खोदती है
बस खोदती ही जाती है
खटर- खटर , खटर-खटर 

तना सूखा कठोर है
पत्ते हैं न  फल हैं
फिर भी रोज आकर करती है
खटर -खटर ,खटर -खटर

मैनै दादी से पूछा
वो बता रही थी
चिड़िया घर बना रही है
खटर -खटर, खटर -खटर।

हेमंत कुमार 'अगम'
भाटापारा छत्तीसगढ़ 
श्रेणी - अतुकांत

Friday, 22 August 2025

बच्चे

जब हम बाल शिक्षण की बात करते हैं ,तो हमारे मन में एक सवाल उत्पन्न होता है। आखिर में ये बाल शिक्षण क्या है ? यह बाल शिक्षण कैसे होना चाहिए,बाल शिक्षण की क्या - क्या सीमाएं हो सकती है ?  जब हम बच्चों को शिक्षण से जोड़ते हैं या जोड़ने का प्रयास करते हैं और बच्चों का विश्लेषण करते हैं तब हमें पता चलता है की ,प्रायः-प्रायः सभी बच्चे एक दूसरे से भिन्न हैं और इतना भिन्न है की एक के लिए बनाया गया मनोविज्ञान , अध्यापन  प्रणाली और उससे संबंधित पैंतरे दूसरे के लिए बिल्कुल ही भिन्न हो जाते हैं ,अन्य बच्चे उस खाचें में बैठते ही नहीं ‌।हमारी योजनाएं समग्र रूप से हर बच्चे के लिए काम ही नहीं करती,और तब हमारी योजनाएं धरी की धरी रह जाती है।
प्रश्न यह उठता है कि आखिर औसतन रुप से इन बच्चों को उनके अनुकूलन की परिधि में दक्षता हासिल करने के लिए किस तरह का सुविधा जनक वातावरण तैयार किया जाय।जिससे वह बच्चा अपने बाहरी अनुकूलन  की दशाओं और स्कूली वातावरण की अनुकूलन दशाओं में सामंजस्य स्थापित कर सके ! मैंने यह भी देखा है ,ज्यादातर सुविधा जनक वातावरण बच्चों को आकर्षित तो करते हैं !पर वह पानी में लकीर खींचने जैसा होता है।
(सुविधा जनक वातावरण से यह आशय है कि हमने जिसमें शिक्षक ,पालक,और शिक्षा से जुड़े हुए शिक्षाविदों ने यह समझकर  कि यह वातावरण बच्चों के लिए उपयुक्त है , ज्यादातर वातावरण का निर्माण कर लिया है यही बच्चों के लिए घातक साबित हो रहा है)
तो क्या हम वातावरण तैयार करने में गलती करते हैं ,यह भी एक लाजमी प्रश्न है?
 शिक्षक इसी काम के लिए व्यवसायिक तौर पर शिक्षा से जुड़ा हुआ है,और यह वातावरण शिक्षक की व्यवसायिक कार्यकुशलता और बच्चों की पूर्व और वर्तमान अनुकूलन की दशाओं के सामंजस्य पर निर्भर कर सकती है।
वातावरण तैयार करने में दो चीज़ें महत्वपूर्ण हो सकतीं हैं
एक तो नया वातावरण जिसमें वह प्रवेश करने वाला है ,और उस वातावरण में अनुकूलन की सीमाएं ?
और बच्चे का वर्तमान वातावरण जिसमें वह अनुकूलित है,में अनुकूलन की सीमायें
हमें यह भी ज्ञात होना चाहिए एक बच्चा कई तरह के वातावरण में एक साथ रहता है अनुकूलित होकर, पर एक शिक्षण ही है जिसे हम बच्चों के साथ अनुकूलित करने के लिए नि:सहाय अवस्था तक पहुंच जाते हैं?
इसका बुनियादी फर्क है और वह फर्क यह है की बच्चा कई तरह के वातावरण में स्वयं अनुकूलित हुआ रहता है और जब शिक्षण की बात आती है तो हम बच्चों को अनुकूलित करना चाहते हैं l

और फिर एक खेल शुरु होता है अवधारणा से खेलने की जिसे ज्यातर बच्चे खेलते हैं और सिक्सर भी लगाते हैं ,

Thursday, 21 August 2025

निर्विचार

       निर्विचार 

मैं जागना चाहता हूं 
आसमान के नीचे
और धरती के ऊपर 
बीच निर्वात में
तारों को नजदीक से
और धरती को दूर से
देखना चाहता हूं 
मैं छूट जाना चाहता हूं 
उस नाम से जिसमें
ग्रहों और नक्षत्रों की
छाया हो
मैं छूट जाना चाहता हूं
उस ज्ञान से
जिसे किसी ने
प्रतिष्ठित किया हो
मैं मुझ पर
स्वंय को
स्थापित होने देना 
चाहता हूं
उस तरंग के साथ
आंदोलित होना चाहता हूं
जो मुझमें पूर्ण रूप में 
सागर की तरह व्याप्त है
मैं उस रौशनी के साथ
चलना चाहता हूं
जो विचारों को लांघकर
उस पथ तक ले जाए
जहां मैं
निर्विचार हो पाऊं....

हेमंत कुमार 'अगम'
भाटापारा छत्तीसगढ़ 






Sunday, 6 July 2025

प्रेम

मैं तुमसे
अगाध
प्रेम करता हूं
पर उस तरह नहीं
जिस तरह तुम
या दुनिया 
चाहती है
यह जो तरह शब्द है
प्रेम को
अपूर्ण कर देती है
सच कहूं तो
मैं तुम्हारी 
भावनाओं के
उस हिस्से में
रहना चाहता हूं
जहां घोर
रेगिस्तान है
गर्म हवाएं
जहां रेतों को
इधर से उधर
पटकती रहतीं है
मैं उस रेगिस्तान की
उष्णता में 
प्रेम को तलाशना 
चाहता हूं
मैं उस रेगिस्तान में
प्रेम का बीज
बोना चाहता हूं
और
बादल बनकर
बरसना चाहता हूं.....

हेमंत कुमार 'अगम'
भाटापारा छत्तीसगढ़ 



Friday, 4 July 2025

सुबह सुबह

सूरज निकलने से पहले
सुबह चार बजे ही 
'सुबह' उठ जाती है
पोंछा बर्तन करती है
घर आंगन को
झाड़ू करती है
चूल्हा जलाती है
पूरे घर के लिए
खाना बनाती है
और फिर
बच्चों के स्कूल
जाने के लिए
काम पर
जाने वाले
अपनी  मरद* के लिए
और खुद के लिए
टिफिन बांधती है
फिर 'सुबह'
लकर-धकर*
नहाती है
और
निकल पड़ती है
अपनी आंचल को
समेटती हुई 
अपनी तीन्नी को
खोंसती हुई
हंसते हंसते
अपना टिफिन लेकर
अपने गीले बालों
को सड़क पर
फटकारती हुई
तेज कदमों से
सुबह सुबह ही
काम पर.....

हेमंत कुमार'अगम'
भाटापारा छत्तीसगढ़ 

Tuesday, 1 July 2025

शब्द


शब्द मुझसे आकर
कहता  है
मुझे कविता में
न ढालो
मुझे गद्य में 
न लिखो
मुझे व्याकरण में
न बांधों
बंधकर रहना
मुझे अटपटा सा
लगता है
मुझे छोड़ दो
पलास के फूलों पर
पीपल के पत्तों पर
झूलने दो फुनगियों पर
मुझे छोड़ दो
पुरवाई के संग
उसकी तरंगों में
मुझे बहने दो
मुझे छोड़ दो
चिड़ियों के बीच
उनके कलरव के संग
चहकने  दो
मुझे छोड़ दो
नदियों के बीच
बहने दो
नदियों की कल-कल में रमने दो
मुझे छोड़ दो
आदिवासियों के बीच
उनके मचानों पर
मुझे खेलने दो
मुझे छोड़ दो
गांव की गलियों  में
उछलने कूदने दो
मुझे छोड़ दो
अनगढ़ अनपढ़ों
के बीच
मुझे उनके मुख से
मुखरित होने दो....

हेमंत कुमार 'अगम'
भाटापारा छत्तीसगढ़ 






Thursday, 26 June 2025

प्रकृति और स्त्री

प्रकृति 
सृजन के लिए ही बनी है
जिसे हम टूटना कहते हैं
जिसे हम जुड़ना कहते है
असल में वह
सृजन ही है
प्रकृति के
रचनात्मक मात्र 
एक क्रम में
टूटना और जुड़ना
दोनों ही परिस्थितियां
प्रकृति की अपार
रचनात्मक 
विशालता का प्रतीक है
हम प्रकृति की प्रकृति को
स्त्री की प्रकृति कह सकते हैं
दोनों में  संरचनात्मक 
समानताएं हैं
इसी लिए अगर
स्त्री को समझना हो तो
प्रकृति के रास्ते से ही
ही समझना होगा
और प्रकृति को समझना हो तो
स्त्री के रास्ते से ही समझना होगा....

हेमंत कुमार 'अगम'
भाटापारा छत्तीसगढ़ 
 

Tuesday, 24 June 2025

पिता

एक कमीज थी
वो जब पहनी गई
फिर उतारी नहीं गई।
एक जूता था,
उसे जब पहना गया, 
फिर उतारा नहीं गया।
वो कमीज हर
थपेड़ों को सहती रही,
वो जूता हर
मुश्किलों को पार करता रहा।
कमीज दरकती रही,
जूता घिसता रहा,
हर अनुकूल और विपरीत 
मौसम में पहनी गई
एक ही कमीज,
एक ही जूता।
जिसने पहना था,
वो अजीब शख्स था।
वह रोया भी तो
बिना आंँसुओं के,
वह हंसा भी तो
बिना होंठ के।
असल में वो,
मौन रहकर,
सड़कर गलकर,
खाद बनना चाह रहा था।
वो अपना एक एक कतरा,
खाद बनने में ,
लगा रहा था।
जिससे संतति मिटृटी में
अपनी जड़ रोप सके,
और इस बात पर
उसे
संतोष था अपने होने का
अपनी जवाबदारी का
वो अजीब शख्स 
एक पिता था....

हेमंत कुमार "अगम"
भाटापारा छत्तीसगढ़

Thursday, 19 June 2025

जन-गण मन


भारत में बहता हुआ समीर
केवल समीर नहीं है
इस समीर में
अनंत सभ्यताओं का
अनंत संस्कृतियों की
आभा पुंज है
वसुधैव कुटुंबकम् का
संकल्प है
यह आदर्श है 
विभिन्नताओं में
समानता का
यह समीर
भारत में
बहने वाला
प्राण पुंज है
और जब यह 
प्राण पुंज
असंख्य भारतीयों के
रगों में घुलता है
तो रग -रग
प्राणमय हो जाता है
फिर यही प्राण
हिमालय की वृहद छोर से
कन्याकुमारी तक
गुजरात से पश्चिम बंगाल तक
असंख्य रुधिर कोशिकाओं में अनवरत
बहता रहता है
एक एक भारतीय में
ऊर्जा और ज्ञान का संचरण करता है
और एक-एक भारतीय 
रविन्द्र के गीतों में बंध जाता है
जन गण मन की तरह....

हेमंत कुमार 'अगम'
भाटापारा छत्तीसगढ़ 




कबीर

पता है 
जैसे
किराने की दुकान
हर चौराहे पर
होती है
तुम्हारा व्यापार 
हो रहा है
तुम केवल
एक किराने की
व्यापार का सामान
हो गये हो
कोई तुम्हें खरीदता है
कोई तुम्हें बेचता है
कोई तुम्हे प्रायोजित करता है
तुम्हारी दोहे साखियां 
सब बिक रहीं हैं
तुम्हारा एक एक कहा
पंडालों पर बेची जा रही है
सबसे बड़ी बात 
तो यह है
तुम्हारे नाम से भी
पंथ बना लिए गये हैं
तुम कई तथाकथित 
संतो के रूप में 
अवतरित कर लिए गये हो
तुम्हें मूर्ति बनाकर
पूजा जा रहा है
बेचा जा रहा है
तुम  बिक रहे हो
धड़ाधड़
क्या तुम्हें पता है
"कबीर"
जो तुम कभी नहीं बनना
चाहते थे
तुम वही बना लिए गये हो....

हेमंत कुमार "अगम"
भाटापारा छत्तीसगढ़ 

Friday, 25 April 2025

मेरा गांव


मेरा गांव

मिट्टी के घरों से
जीवन जा चुका है
अस्थि पंजर भी
धीरे -धीरे गलकर
खाक हो चुके हैं
खपरैलें टूटकर
बिखर गयीं है 
अब बरसात गिरता है
तो धड़ाम से गिरता है
कांक्रीट की छत पर
और कांक्रीट की गलियों पर
नीम का पेड़ सूख चुका है
उसके नीचे विराजमान 
'महमाई' देवी को
उसका नया कांक्रीट का
घर मिल चुका है
तालाब में 'पचरियां'
कांक्रीट की हो गयीं हैं
गांव के चारों तरफ
जो 'परिया'थीं
लूट लिए गये हैं
अब गांव की शांति
कांक्रीट की दीवारों
और कांक्रीट की गलियों से
टकराकर टूट जातीं हैं
कांक्रीट की घरों में रहकर 
लोगों की सोच और भावनाएं 
मानो कांक्रीट की
हो गयी है.....

हेमंत कुमार "अगम"
भाटापारा छत्तीसगढ़ 




Sunday, 20 April 2025

तुम्हारा रहेगा क्या.....

मैं तुम्हारा 
साथ देना चाहता हूं
पर सोचता हूं
मेरा साथ पाकर
तुम कहीं तुम्हारी
वास्तविकता खो  न दो
डरता हूं
तुम्हारे भीतर जो
लय और ताल पनपेगा 
वह मेरे कदमों का ही
प्रतिरूप न हो जाये 
तुम्हारी चेतना
कहीं मेरे विचारों का
समर्थन न करने लगे
इस तरह से तो
तुम
मेरी तरह हो जाओगे
फिर तुम्हारे पास
तुम्हारा रहेगा क्या.....

हेमंत कुमार "अगम"
भाटापारा छत्तीसगढ़ 




Saturday, 19 April 2025

पुन:

जिस घर में
मां की हाथों से
मिट्टी का लेप चढ़ा हो
जिस घर में 
मां की हाथों से
गोबर का रंग चढ़ा हो
जिस घर का
बाबूजी नींव हुए हों
उस घर का
हर एक कोना
स्वर्ग से भी
सुन्दर होता है
उस घर में
रहना
प्रेम और संस्कारों 
के बीच रहना है
जहां 
त्याग है
तपस्या है
जीवन है
ऐसा जीवन
जिसे पुन:
पाने के लिए
बार बार
मरने का मन होता है.....

हेमंत कुमार "अगम"
भाटापारा छत्तीसगढ़ 









Thursday, 17 April 2025

मैं और तुम

मैं और तुम

मैं और मेरा मैं
एक हो जाते हैं
कितनी आसानी से
मैं जो चाहता हूं
वहीं मेरा मैं भी चाहता है
तुम जो चाहते हो
वह तुम्हारा मैं चाहता है
तुम और तुम्हारा मैं
एक हो जाते हो
कितनी आसानी से
मैं केवल मेरा मैं चाहता हूं
और तुम केवल तुम्हारा मैं चाहते हो
मैं और तुम का
मिलना हम हो सकता है
पर मेरा मैं और तुम्हारा मैं
मध्यप्रदेश से गुजर रही
कर्क रेखा की तरह है.....


हेमंत कुमार "अगम"
भाटापारा छत्तीसगढ़ 

एक पथ पर


एक पथ पर

चलो अच्छा ही हुआ
मैं अकेला चल पड़ा
लोगों का क्या है
सफ़र में
कुछ भी लाद देते
मेरी पीठ पर
अपना बोझ उतारने के लिए
और मैं उस बोझ तले
दब जाता
किसी के विचारों को लादना
अपनी पीठ पर
यह मेरे लिए तो संभव नहीं था
इसीलिए 
मैं चल रहा हूं
अपने विचारों के साथ
एक नवीन ऊर्जा के साथ
एक पथ पर
अकेला ही.....

हेमंत कुमार"अगम"
भाटापारा छत्तीसगढ़ 

फूल की पीड़ा

"फूल की पीड़ा"


सुबह खिल भी ठीक से 
नहीं पाती है फूल
और उस फूल के
नृहसंस हत्यारे
उसे बलि का सामान 
समझने वाले
हथियारों से लेश
उसे तोड़ने पहुंच जाते है
फूल सुंदर होतीं हैं
खुशबुओं से भरीं होती है
इसका अर्थ यह तो नहीं
कि उसे अपने 
घरों में फंक्शन के लिए
नेताओं को रिझाने के लिए
मस्जिदों में महकने के लिए
अर्थियों को जीवंत करने के लिए
देवालयों में देवताओं को
प्रसन्न करने के लिए
तोड़ा जाय
और बली चढ़ा दिया जाय
फूल अमूक है
उसे बोलना नहीं आता
हम तो मानव हैं
हमें तो बोलना लिखना पढ़ना समझना
सब कुछ आता है
और सब कुछ जानते हुए
हम जानबूझ कर 
टूट पड़ते हैं
किसी का वंश
उजाड़ने के लिए
इसी लिए 
छोटी छोटी कलियों
और फूलों को तोड़ने 
वालों को
हत्यारा कहने में
कोई अतिशयोक्ति नहीं है.....

हेमंत कुमार "अगम"
भाटापारा छत्तीसगढ़ 

भूख(लघु कहानी)

भूख

आज दिन भर कई मोहल्लों की खाक छानने के बाद, जमनी को कुछ पुरानी शीशियाँ और प्लास्टिक बेचकर थोड़े रुपये ही मिले।उस रुपय में उसने कुछ क्षण के लिए सही भूख की पीड़ा को खरीद लिया था ।वह खुशी-खुशी घर लौट रही थी। उसे कल भरपेट भोजन नहीं मिला था। इसलिए मन ही मन सोच रही थी—"आज अम्मा से कहूँगी कि कोई अच्छी सब्ज़ी और भात बनाए, तो पेट भर खाऊँगी।"इसी संतुष्टि के लिए ही तो वह इतनी मेहनत करती है।
पर जैसे ही जमनी घर पहुँची, उसने देखा कि उसका बाप शराब के नशे में बड़बड़ा रहा है। जमनी को उसने अधखुली आंखों से देखते हुए घुड़ककर बोला, "ला री तेरी कमाई!"
यह कहते हुए उसने जमनी के हाथों से सारा पैसा छीन लिया। विरोध करने पर जमनी को इनाम में दो रपट भी मिले। बेचारी जमनी... डर के मारे रो भी न पाई। आज फिर उसकी मेहनत की कमाई उसके नशेड़ी बाप की बोतलों के लिए कुर्बान हो गई थी।

समोसे के कुछ बचे-खुचे टुकड़े ,जो उसके नशेड़ी बाप ने छोड़ रख्खे थे और अम्मा द्वारा दबाकर रखी गई एक सूखी, पतली रोटी ही उसका सहारा बने। इन्हीं से कुछ समय के लिए भूख से राहत मिली।
पर एक रोटी कब तक टिकती? थोड़ी ही देर में भूख ने फिर से जमनी को जकड़ लिया। पेट की आग ने जमनी को  रात भर सोने नहीं दिया।

वह करवटें बदलती रही—कभी अपने भाग्य को कोसती, कभी अपने बाप को कोसती ! पल भर में रो पड़ती। कभी मन होता घर से चुपचाप भाग जाए, फिर सोचती—"जाऊँगी तो आखिर  जाऊंगी कहाँ?"

बार-बार खपरैल की दरारों के बीच बने रोशनदान को देखती और सुबह की आहट टटोलने लगती।

जैसे ही चिड़ियों ने चहचहाना शुरू किया, वह तपाक से उठ खड़ी हुई। उसने मुँह तक नहीं धोया। भूखे पेट में जैसे जान आ गई थी। आज उसने अम्मा को भी नहीं जगाया।

अपनी ही ऊँचाई की एक बोरी उठाई और तेज़ क़दमों से कूड़े के ढेर की ओर भागने लगी। उसकी आँखों में एक अजीब सा उतावलापन तैर रहा था। वह कभी किसी घर के सामने आँट को देखती, कि कहीं किसी ने कुत्तों या गायों के लिए कोई रोटी का टुकड़ा तो नहीं डाल रखा—"काश! वही खाकर मैं तृप्त हो जाती"पर भाग्य ने तो जमनी को जैसै  छलना सीख लिया था।

कभी कूड़े के ढेरों पर आँख गड़ाती, शायद कुछ बेचने लायक सामान मिल जाए। चलते-चलते उसने एक विवाह भोज वाले घर को देखा। बगल में रखी पत्तलों पर नज़र डाली, तो देखा—सारे दोने-पत्तल पहले ही चाटे जा चुके थे।मन ही मन सोचती क्या मेरा भाग्य उन गली के कुत्तों से भी गया गुजरा है!

उसका मन पूरी तरह से भूख और हताशा में डूब गया था। मन ही मन बुदबुदाई—"हाय मैया, आज भी कुछ खाने को नहीं मिलेगा क्या?"

फिर उसे परसों की बात याद आ गई—जब किसी मोहल्ले में एक भैया ने दावत में बचा खाना दे दिया था। कैसे उसने छककर बिरयानी और गुलाब जामुन खाए थे। "अहा! उस दिन तो मज़ा ही आ गया था..."

तभी अचानक गाड़ी की तेज़ हॉर्न से वह चौंक गई और बाल-बाल बची। ड्राइवर ने झिड़कते हुए कहा,
"मरना है क्या?"
और यह कहकर वह चलता बना।

बेचारी जमनी भूख से बेहाल हो चुकी थी। दोपहर के बारह बज चुके थे। भूख से  उसका पूरा शरीर तांडव करने लगा था।

आँतें जैसे रीढ़ से लिपट गई थीं, मानो कोई नागिन डसने के लिए कुंडली मारकर फन फैलाए बैठी हो—बस डसना बाकी हो।

भूख से कराहती हुई जमनी बड़ी मुश्किल से सड़क किनारे पालिका के नल तक पहुँची। पीठ पर लदी बोरी—जो  पुराने डिब्बों और झिल्लियों से कुछ भरी थी—नीचे रखी और गंदे हाथों से नल का पानी पीने लगी।

भूख ने आँतों को इतना संकीर्ण कर दिया था कि दो घूंट पानी पीते ही वह दर्द से कराह उठी। पेट दबाते हुए वह सीधा सर के बल ज़मीन पर धड़ाम से गिर पड़ी...

हेमंत कुमार "अगम"
भाटापारा छत्तीसगढ़

Tuesday, 15 April 2025

डेथ सर्कल

डेथ सर्कल


आकाश के ऊपर भेड़ों के
कई झुंड दौड़ रहे  थे
कोई काला कोई चितकबरा
कोई भूरा कोई सफेद झुंड
हवायें खेद रही थी उनको
चक्रवात के पैटर्न में
उन्हें पता ही नहीं था
इस अंतहीन यात्रा के बारे में
और वे सब दौड़ रहे थे 
दौड़े जा रहे थे...
डेथ सर्कल पर
असर ये हुआ
उन भेड़ों की तरह
पृथ्वी पर भी 
भेंड़ें
दौड़ रही थी
डेथ सर्कल पर...


हेमंत कुमार "अगम"
भाटापारा छत्तीसगढ़ 

मैं बार -बार आउंगा

मैं बार-बार आऊंगा
बार-बार मरने के लिए....
मुझे मरना अच्छा लगता है
अपने देश के लिए.....
देश किसी के लिए
रहने का जगह होगा
देश मेरे लिए
तपस्या की जगह है
त्याग का जगह है
इसी लिए मैं 
बार बार आउंगा
बार बार तपूंगा
बार बार खपूंगा 
मेरी मां कहती है
तू तपता है 
तू खपता है तो
देश जी उठता है....



हेमंत कुमार "अगम"
भाटापारा छत्तीसगढ़ 

Friday, 11 April 2025

एक अजनबी लड़की

दौड़ कर
अचानक 
एक अजनबी लड़की
अपनी संपूर्ण वात्सल्यता 
के साथ
मुझसे लिपटने आती
मैं सहम जाता
सहम इस लिए जाता
क्यों की
मुझमें पुरूष होने का
डर जो विद्यमान है
मैनै सुना है
पुरूष होने का
भय और दुर्भाग्य 
फिर भी मैं
घुटने टेककर
जब वह आती
बांहें फैला लेता
एक ओर उसका
वात्सल्य 
एक ओर मेरा
पितृत्व 
दोनों मिल जाते
एक आलौकिक 
संस्कार के साथ
हम दोनों
सदैव के लिए
एक बंधन में बंध जाते
मैं उसका पिता हो जाता
और वो मेरी बेटी.....

हेमंत कुमार ,"अगम"
भाटापारा छत्तीसगढ़ 

Tuesday, 8 April 2025

पुनर्जन्म



पुनर्जन्म 

मां की गर्भ से 
जन्म होना
एक प्राकृतिक 
चरण है
अपने होने को प्रमाणित 
करने के लिए
जन्म लेने के बाद
एक बार और
जन्म लेना चाहिए 
यह जन्म 
आत्म विवेचन
के लिए होना चाहिए 
यह जन्म 
मानवता के 
उत्कर्ष के लिए
होना चाहिए 
कहीं ऐसा भी हो
जन्म हुआ नहीं
और आदमी
मर जाये......

हेमंत कुमार"अगम"
भाटापारा छत्तीसगढ़ 

Monday, 7 April 2025

घर की तरफ

दूर तक मैं नहीं जाऊंगा
मुझे दूरियों से डर लगता है
मुझे चांद और तारे तोड़ लाने में
जरा भी दिलचस्पी नहीं है
हां दफ्तर जरूर जाउंगा
झोला लिए मुस्कुराते हुए
वापसी में झोला भरकर
सब्जियां लाउंगा
बच्चों को सामने वाले उद्यान में
टहला लाउंगा 
मम्मी के लिए मेडिकल से
दवाई ले आउंगा
श्रीमती को पास के ब्यूटी पार्लर तक
छोड़ आउंंगा
घर में सबके पास होने से
घर गुलाब की तरह 
महक उठता है
जो खुशी मिलती है
घर में
उसे सहेजने के लिए
रात होने से पहले मैं
घर की तरफ लौट आउंगा....

हेमंत कुमार "अगम"
भाटापारा छत्तीसगढ़ 
यह कविता मौलिक और अप्रकाशित है


काला धूप

जब वह थकता है
धूप के रेशमी 
तारों को ओढ़कर
सो जाता है
धूप से लिपटकर
उसे आराम करना
आता है...
धूप से लिपटकर
बस आराम ही नहीं
वह काम भी करता है
और धूप उसके प्रेम में
असंख्य रजत कणों के रूप में
उसके माथे पर 
पसर जाता है
प्रेम इतना की
जब वह नहीं आता 
धूप उनसे मिलने
खुद से चला जाता है
टूटे हुए छप्परों के बीच से...
उसने भी धूप को
आत्मसात कर लिया है
और तभी तो वह
काला हो गया है.....


हेमंत कुमार "अगम"
भाटापारा छत्तीसगढ़ 

Sunday, 6 April 2025

आदमी

जब से आदमी 
जंगल से भागकर
मैदानों में रहने लगा है
उसका स्वाद ही
बदल गया है
तब से आदमी
आदमी को
खा  रहा है
आदमी आदमखोर हो गया है
और उसने
सुसंस्कृत या सभ्य
दिखते रहने के लिए
सभ्यता और आधुनिकता 
का खाल पहन लिया है
पहले आदमी
जब नंगा रहता था
सही मायनों में
आदमी तब आदमी होता था......


हेमंत कुमार"अगम"
भाटापारा छत्तीसगढ़ 

Friday, 4 April 2025

"मैं आलौकिक से सोचता हूं"

"मैं आलौकिक से सोचता हूं"

१------मैं बाहरी दुनिया को देखता रहा
केवल अपने लिए
उसी के अनुरूप स्वंय को
ढालने की कोशिश करता रहा
इस तरह मैं स्वंय में
उलझकर मात्र रह गया
मेरा होना एक तरह से
न होने की तरह रहा
भीतर की तरफ
ध्यान ही नहीं गया
और एक दिन फिर
नि:शब्द हो गयी आत्मा
चलन से बाहर हो गये अंग
अंतत:जला दिया गया आग में 
या मिट्टी में खपा दिया गया

हेमंत कुमार "अगम"
भाटापारा छत्तीसगढ़ 



Wednesday, 2 April 2025

जीवन और मृत्यु

जीवन और मृत्यु 


माता और पिता के
मिलने से 
एकाकार हुआ
फिर गर्भ में ही
उनसे अलग होता रहा
एक दिन 
पूर्णतः अलग हो गया
और स्वतंत्र हो गया
यही विन्यास है!!!
तो क्या विन्यास ही
जीवन है..???
और एकाकार होना 
मृत्यु है।



हेमंत कुमार "अगम"
भाटापारा छत्तीसगढ़ 

तू जल तो सही


तू जल तो सही


तू जल तो सही
तू खप तो सही

पर्वत भी नतमस्तक होगा
सागर भी मीठा होगा
जीवन की जड़ता में
गोबर जैसे सड़ तो सही

दंभ ढले सड़कों से
वापस मुड़
पथरीली राहों पर चल
छाले हो तो सही

किसानों की पीड़ा में
अपना नीर बहाना सीख
बर्रे की खेतों में जाकर 
प्यारे चल तो सही

नहाया कर धूलों से
मिट्टी से बतियाया कर
कामगार के कपड़ों सा
दरक कर फट तो सही

तू जल तो सही
तू खप तो सही

हेमंत कुमार "अगम"
भाटापारा छत्तीसगढ़