Wednesday, 25 March 2026

मूक संघर्ष

मूक संघर्ष

फटी हुई साड़ी पहने,
बाजू से पोल्का दरका हुआ।
सिर पर पल्लू ओढ़े एक औरत,
टूटी हुई चप्पल पहने।
कभी तेज़ कदमों से चलती है,
कभी दौड़ने जैसा चलती है।
वह चल रही है,
अपनी गरीबी को ढोते हुए,
करोड़ों की सड़कों पर।
जैसे ही एक आलीशान घर आता है,
वह उस घर में पलक झपकते ही
मानो ओझल हो जाती है।
लगभग एक घंटे बाद,
हाथ में झिल्ली का थैला लिए
उस आलीशान घर से
सरसराकर निकलती है।
फिर तेज़ कदमों से चलती हुई,
उसी चमचमाती सड़कों पर,
दूसरे आलीशान घर में गुम हो जाती है।
फिर तीसरा आलीशान घर,
फिर चौथा आलीशान घर,
न जाने कितने आलीशान घरों तक
वह दौड़ती होगी ?..
जब सांझ को वह लौटती है,
उसके हाथ में
वही झिल्ली का थैला झूल रहा होता है।
हाथ उस थैले को कसकर पकड़े हुए होते हैं
और कदम पहले से भी तेज़।
कभी दौड़ने जैसा चलती है,
तो कभी दौड़ती है।
इस वापसी में
उसकी आँखें
जैसे उसके सिर पर चारों तरफ लगी हुई होती हैं।
होटल आने पर होटल की तरफ,
फल की दुकान आने पर फल की दुकान की तरफ,
खिलौने की दुकान आने पर
खिलौनों की तरफ।
कपड़े की दुकान के पास
जैसे वह रुक ही जाती है
और उस दुकान को गौर से देखती है।
पता नहीं, उसकी आँखों में ख़्वाब हैं,
या उसकी आवश्यकताओं का चलचित्र,
या उसकी विवशता की पुतलियाँ।
दौड़ते-दौड़ते जब वह
तंग गलियों में पहुँचती है,
तो वह और ज़ोर से दौड़ने लगती है।
एक तंग गली में,
तीसरा मकान छोड़कर
उसका टूटा हुआ झोपड़ा है।
जैसे ही झोपड़े के पास आती है,
वह सकपकाकर झिल्ली का थैला पकड़े हुए
उस झोपड़े में गुम हो जाती है,
जैसे सुबह-सुबह पक्की सड़क किनारे
आलीशान घर में
गुम हो जाती है।

हेमंत कुमार "अगम"
भाटापारा, 

Tuesday, 24 March 2026

भूखा घर

धान की पौधों पर,
गेहूँ की बालियों पर,
अमराई पर,
तीज-त्योहारों पर,
नदी के घाटों पर,
जंगल पर, पहाड़ पर,
बाज़ार की आवाज़ों में,
गली-गली हर गाँव में,
घर के आँगन में—
तू-तू, मैं-मैं, खींचा-खींची में,
माँ के प्यार में,
पिता की फटकार में,
दादी के दुलार में,
जहाँ बोलियाँ स्वतः फूटती हैं।
यहाँ तक नहीं,
खेत जोतते किसानों का,
फसल काटती महिलाओं का,
यह गीत है, संगीत है।
ये किसी विश्वविद्यालय की देन नहीं,
वे मनुष्यों की साँसों से उगती हैं।
जहाँ दो लोग मिलते हैं,
वहाँ शब्द मिलते हैं।
जहाँ दो लोग, चार लोग बसते हैं,
वहाँ स्वतः बोलियाँ जन्म लेती हैं।
और बोलियों के साथ स्वतः व्याकरण जन्म लेता है।
कभी पहाड़ उन्हें मोड़ देता है,
कभी नदी उनका उच्चारण बदल देती है,
कभी दूरी उनके शब्दों को नया रूप दे देती है।
पर बोलियाँ सगी बहनों की तरह
मेल-मिलाप कर ही लेती हैं।
और फिर एक दिन,
कोई सत्ता कहती है—
“ये बोलियाँ अस्पृश्य हैं, इन्हें बदल डालो।”
और बोलियाँ, बेचारी, राजसत्ता के आगे
नतमस्तक हो जाती हैं।
और फिर किसी एक बोली के साथ
होता है व्यभिचार।
उसे विवश किया जाता है
सत्ता के साथ तालमेल के लिए।
वह बेचारी अबला क्या करे,
वह न चाहते हुए भी
समर्पित हो जाती है जबर्दस्ती।
इसीलिए मैं कहता हूँ,
बोलियों से जो भी भाषा
जीवंत होने का दावा करती है,
असल में वह भाषा कृत्रिम होती है।
और हर भाषा कृत्रिम होती है
इस लिए कृत्रिम होती है
क्यों की वह
राजनीति की कोख से जन्मी होती है।
और उसे जन्माने के लिए 
राजसत्ता के कथित भाषाविद
मानकीकरण की मेज़ पर बैठकर
उसके नियम लिखते हैं।
कभी लिपि तय होती है,
कभी व्याकरण गढ़ा जाता है,
कभी शब्दों को कतार में खड़ा किया जाता है,
कभी उनके अर्थ बदले जाते हैं,
कभी अक्षरों को मरोड़ा-तोड़ा जाता है,
अक्षरों को नचाया जाता है—
जैसे मदारी बंदर नचाता है।
और बोली, न चाहते हुए भी,
भाषा में बदलने के लिए विवश हो जाती है।
पर आम जनमानस के द्वारा
भाषा स्वीकार्य हो ही नहीं पाती।
इसलिए भाषा आज भी
बोलियों में ही बोली जाती है—
शिवाय भाषाविद के...
हेमंत कुमार "अगम"
भाटापारा, छत्तीसगढ़

बोलियां

धान की पौधों पर,
गेहूँ की बालियों पर,
अमराई पर,
तीज-त्योहारों पर,
नदी के घाटों पर,
जंगल पर, पहाड़ पर,
बाज़ार की आवाज़ों में,
गली-गली हर गाँव में,
घर के आँगन में—
तू-तू, मैं-मैं, खींचा-खींची में,
माँ के प्यार में,
पिता की फटकार में,
दादी के दुलार में,
जहाँ बोलियाँ स्वतः फूटती हैं।
यहाँ तक नहीं,
खेत जोतते किसानों का,
फसल काटती महिलाओं का,
यह गीत है, संगीत है।
ये किसी विश्वविद्यालय की देन नहीं,
वे मनुष्यों की साँसों से उगती हैं।
जहाँ दो लोग मिलते हैं,
वहाँ शब्द मिलते हैं।
जहाँ दो लोग, चार लोग बसते हैं,
वहाँ स्वतः बोलियाँ जन्म लेती हैं।
और बोलियों के साथ स्वतः व्याकरण जन्म लेता है।
कभी पहाड़ उन्हें मोड़ देता है,
कभी नदी उनका उच्चारण बदल देती है,
कभी दूरी उनके शब्दों को नया रूप दे देती है।
पर बोलियाँ सगी बहनों की तरह
मेल-मिलाप कर ही लेती हैं।
और फिर एक दिन,
कोई सत्ता कहती है—
“ये बोलियाँ अस्पृश्य हैं, इन्हें बदल डालो।”
और बोलियाँ, बेचारी, राजसत्ता के आगे
नतमस्तक हो जाती हैं।
और फिर किसी एक बोली के साथ
होता है व्यभिचार।
उसे विवश किया जाता है
सत्ता के साथ तालमेल के लिए।
वह बेचारी अबला क्या करे,
वह न चाहते हुए भी
समर्पित हो जाती है जबर्दस्ती।
इसीलिए मैं कहता हूँ,
बोलियों से जो भी भाषा
जीवंत होने का दावा करती है,
असल में वह भाषा कृत्रिम होती है।
और हर भाषा कृत्रिम होती है
इस लिए कृत्रिम होती है
क्यों की वह
राजनीति की कोख से जन्मी होती है।
और उसे जन्माने के लिए 
राजसत्ता के कथित भाषाविद
मानकीकरण की मेज़ पर बैठकर
उसके नियम लिखते हैं।
कभी लिपि तय होती है,
कभी व्याकरण गढ़ा जाता है,
कभी शब्दों को कतार में खड़ा किया जाता है,
कभी उनके अर्थ बदले जाते हैं,
कभी अक्षरों को मरोड़ा-तोड़ा जाता है,
अक्षरों को नचाया जाता है—
जैसे मदारी बंदर नचाता है।
और बोली, न चाहते हुए भी,
भाषा में बदलने के लिए विवश हो जाती है।
पर आम जनमानस के द्वारा
भाषा स्वीकार्य हो ही नहीं पाती।
इसलिए भाषा आज भी
बोलियों में ही बोली जाती है—
शिवाय भाषाविद के...
हेमंत कुमार "अगम"
भाटापारा, छत्तीसगढ़

स्त्री की मीमांसा

स्त्री की मीमांसा

पहले स्त्रियांँ,
न कोई वस्त्र,
न भोजन,
न कोई विचार
पुरुष की अनुमति बिना
स्वीकार कर सकती थीं।
उनकी इच्छाएँ,
उनके भय में समाहित हो जाती थीं,
उनकी आवाज़
चूल्हे के धुएँ में
छटपटाकर घुट जाती थीं।
पर अब,
जब वह पढ़-लिख गई हैं,
विचारों से निर्भीक हो गई हैं,
अपने पैरों पर चलने लगी हैं—
परंतु यह क्या?
अब वही स्त्रियां 
पुरुषों के कपड़े
पहनने लगी हैं
पुरुषों की तरह
खाने लगी है,
पुरुषों जैसे विचार
और व्यवहार
करने लगीं हैं।
मानों 
स्वतंत्रता और निर्भीकता
केवल
पुरुष का प्रतिबिम्ब बन जाना हो।
तो क्या?
पुरुष जैसा बनना ही
स्त्री की मीमांसा है?
क्या समानता का अर्थ
पुरुष की ऊँचाई पा लेना है?
और
अपनी मूल पहचान खो देना है?
क्या स्त्री,
स्त्री होकर 
अपने स्वयं के समकक्ष
नहीं आ सकती?
या फिर—
समस्या स्त्री में नहीं,
उस मापदंड में है
जहाँ
“मनुष्य” का अर्थ ही
“पुरुष” होना मान लिया गया है।

— हेमंत कुमार 'अगम'
भाटापारा, छत्तीसगढ़

Monday, 16 February 2026

पहले मन घर लौट आता है

मैं अपने घर लौटने से पहले
घर लौट आता हूँ।
मेरा शरीर अभी भी
शहर की सड़कों पर होता है,
पर मेरा मन
घर की दालान में
बैठ चुका होता है।
अचानक याद आता है—
छोटी और गुड़िया
इस समय छत पर टहल रहे होंगे।
मन
सीढ़ियाँ चढ़ने लगता है
तेज़ क़दमों से,
छत पर पहुँचकर देखता है—
वे वहाँ नहीं हैं।
फिर नीचे उतरकर
उनके कमरों में झाँकता है—
पर यह क्या?
कमरे भी खाली हैं।
तभी स्मरण होता है—
अरे, वे दोनों तो हॉस्टल में हैं।
हल्की-सी खुशी,
हल्की-सी हताशा लिए
मन
कमरे से निकल आता है।
इसी बीच
कुक्कू के कमरे से सिंथेसाइज़र का मधुर स्वर
सुनाई देता है
और मन शांत हो जाता है।
धीरे-धीरे मैं माँ के कमरे में जाता हूँ।
कमरे में जाते ही
मैं माँ के पास बैठ जाता हूँ।
माँ के पास बैठते ही
मन तंद्रा की अवस्था में
जाने लगता है।
तभी
रसोई से
बर्तनों की धड़ाम सुनाई देती है,
और मन
हवा से भी तेज़ क़दमों से
रसोई की ओर दौड़ने लगता है।
वहाँ देखता हूँ—पत्नी है,
थकी-हारी, बेचारी!
बाल अब भी उलझे हुए हैं,
चेहरे पर पसीने की थाप,
हल्दी और फोरन की छींटें,
और बीच-बीच में मुस्कुराती हुई
कड़ाही पर
मेरी पसंद का
व्यंजन बना रही है।
उसी बीच-बीच में उसके हाथ
बर्तनों की ओर भी बढ़ते हैं,
उन्हें माँजने के लिए…
बेचारी कितनी थक जाती होगी,
पर जब मैं घर आता हूँ,
पत्नी
मेरी आँखों में झाँककर
शरीर की थकान पढ़ लेती है।
वह कुछ पूछती नहीं—
बस इतना भर कहती है,
“हाथ-मुँह धो लीजिए,
मैं खाना लगाती हूँ।”
इतना सुनते ही
मेरे दिन भर की थकान
प्यार और ऊर्जा में बदल जाती है,
घर ,घर नहीं रहता
स्वर्ग हो जाता है।
इसीलिए
रोज शरीर से पहले
मेरा मन घर लौट आता है…
— हेमंत कुमार "अगम"
भाटापारा, छत्तीसगढ़

Saturday, 18 October 2025

गांव


गांव

कुछ गांव
शहर में
पहुंच चुके हैं
गांव को छोड़कर
कुछ गांव निकल रहे हैं
शहर की ओर
गांव छोड़कर
कुछ गांव फुसफुसा रहें हैं
शहर और गांव के बीच
कुछ गांव बैठे हैं
शाम को
अपने -अपने गांव में
बड़े ही शुकून के साथ
और गप्पे लड़ा रहें हैं....

हेमंत कुमार "अगम"
भाटापारा छत्तीसगढ़ 

दीपावली


दीपावली 

बुधरी के घर भी हर साल 
दीप जलता है
दीपावली पर
पूरा गांव दीप जलाता है
इस लिए वह भी
जलाता है
पूरा गांव दीपावली के दिन
अपने वैभव का
सत्कार करता है
खील बताशे मिठाइयां 
और भी न जाने
क्या क्या व्यंजन
दीप को अर्पित किये जाते हैं
पूरा गांव दीपावली पर
तेल के दिये की रौशनी से
मानो नहा उठता है
पूरा गांव उस दिन
अद्भुत व्यंजनों का
रात भर लुत्फ उठाता है
पर बुधरी और उसकी बाई को
दीपावली के कुछ दियों को 
रौशन करने के लिए
अपने भूख को
बिना खाये-पिये ही
सुलाना पड़ता है...

हेमंत कुमार "अगम"
भाटापारा छत्तीसगढ़