पुरुष वेश्या
स्त्री को
हमेशा देह में पढ़ा गया,
और पुरुष को
चरित्र में।
यहीं से
भ्रम शुरू होता है,
क्योंकि
देह दिखाई देती है
और मन
अपने को छुपा लेता है।
पुरुष
देह से नहीं,
अपनी इच्छाओं से
वेश्या-वृत्ति करता है।
वह कहीं जाता नहीं,
पर हर जगह उपस्थित रहता है-
अपनी कल्पनाओं में,
अपनी विचारधाराओं में।
उसकी चेष्टा
व्यवहार में नहीं,
व्यवहार को दृष्टांत में
बदलने की होती है,
जो
नैतिकता का सबसे शांत
प्रतिरूप है।
समाज
उसे स्थायित्व देता है,
नाम देता है,
पुरस्कार देता है,
और वह
इन सबके भीतर
बिना भय के
एक अदृश्य दृष्टिकोण जीता है,
जो व्यभिचार से परिपक्व होता है।
वह
एक से दूसरी,
दूसरी से तीसरी,
और न जाने
कितनी
यात्राएँ करता है
बिना गए हुए।
वह भूत की तरह
किसी कल्पना-रेखा में
बेखौफ़
चला जाता है।
यहीं
व्यभिचार की
सूक्ष्मता परिलक्षित होती है,
जहाँ शरीर कम,
चेतना अधिक
विचलित होती है।
और यह आचरण
हर पुरुष करता है,
वह अपनी स्वीकृतियों के भीतर
अपनी ही अस्वीकृतियों
के समानांतर चलता है।
इसीलिए वेश्यावृत्ति
केवल देह का सौदा नहीं,
इच्छा का भी है।
तो पुरुष
उसके बाहर नहीं है,
बस
उसकी मुद्रा
अदृश्य है,
और उसका बाज़ार
मन के भीतर भी
और बाहर भी लगता है।
अतः पुरुष को
भी वेश्या कहने में
कैसी शर्म....
हेमंत कुमार "अगम"
भाटापारा, छत्तीसगढ़
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