मूक संघर्ष
फटी हुई साड़ी पहने,
बाजू से पोल्का दरका हुआ।
सिर पर पल्लू ओढ़े एक औरत,
टूटी हुई चप्पल पहने।
कभी तेज़ कदमों से चलती है,
कभी दौड़ने जैसा चलती है।
वह चल रही है,
अपनी गरीबी को ढोते हुए,
करोड़ों की सड़कों पर।
जैसे ही एक आलीशान घर आता है,
वह उस घर में पलक झपकते ही
मानो ओझल हो जाती है।
लगभग एक घंटे बाद,
हाथ में झिल्ली का थैला लिए
उस आलीशान घर से
सरसराकर निकलती है।
फिर तेज़ कदमों से चलती हुई,
उसी चमचमाती सड़कों पर,
दूसरे आलीशान घर में गुम हो जाती है।
फिर तीसरा आलीशान घर,
फिर चौथा आलीशान घर,
न जाने कितने आलीशान घरों तक
वह दौड़ती होगी ?..
जब सांझ को वह लौटती है,
उसके हाथ में
वही झिल्ली का थैला झूल रहा होता है।
हाथ उस थैले को कसकर पकड़े हुए होते हैं
और कदम पहले से भी तेज़।
कभी दौड़ने जैसा चलती है,
तो कभी दौड़ती है।
इस वापसी में
उसकी आँखें
जैसे उसके सिर पर चारों तरफ लगी हुई होती हैं।
होटल आने पर होटल की तरफ,
फल की दुकान आने पर फल की दुकान की तरफ,
खिलौने की दुकान आने पर
खिलौनों की तरफ।
कपड़े की दुकान के पास
जैसे वह रुक ही जाती है
और उस दुकान को गौर से देखती है।
पता नहीं, उसकी आँखों में ख़्वाब हैं,
या उसकी आवश्यकताओं का चलचित्र,
या उसकी विवशता की पुतलियाँ।
दौड़ते-दौड़ते जब वह
तंग गलियों में पहुँचती है,
तो वह और ज़ोर से दौड़ने लगती है।
एक तंग गली में,
तीसरा मकान छोड़कर
उसका टूटा हुआ झोपड़ा है।
जैसे ही झोपड़े के पास आती है,
वह सकपकाकर झिल्ली का थैला पकड़े हुए
उस झोपड़े में गुम हो जाती है,
जैसे सुबह-सुबह पक्की सड़क किनारे
आलीशान घर में
गुम हो जाती है।
हेमंत कुमार "अगम"
भाटापारा,
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