स्त्री की मीमांसा
पहले स्त्रियांँ,
न कोई वस्त्र,
न भोजन,
न कोई विचार
पुरुष की अनुमति बिना
स्वीकार कर सकती थीं।
उनकी इच्छाएँ,
उनके भय में समाहित हो जाती थीं,
उनकी आवाज़
चूल्हे के धुएँ में
छटपटाकर घुट जाती थीं।
पर अब,
जब वह पढ़-लिख गई हैं,
विचारों से निर्भीक हो गई हैं,
अपने पैरों पर चलने लगी हैं—
परंतु यह क्या?
अब वही स्त्रियां
पुरुषों के कपड़े
पहनने लगी हैं
पुरुषों की तरह
खाने लगी है,
पुरुषों जैसे विचार
और व्यवहार
करने लगीं हैं।
मानों
स्वतंत्रता और निर्भीकता
केवल
पुरुष का प्रतिबिम्ब बन जाना हो।
तो क्या?
पुरुष जैसा बनना ही
स्त्री की मीमांसा है?
क्या समानता का अर्थ
पुरुष की ऊँचाई पा लेना है?
और
अपनी मूल पहचान खो देना है?
क्या स्त्री,
स्त्री होकर
अपने स्वयं के समकक्ष
नहीं आ सकती?
या फिर—
समस्या स्त्री में नहीं,
उस मापदंड में है
जहाँ
“मनुष्य” का अर्थ ही
“पुरुष” होना मान लिया गया है।
— हेमंत कुमार 'अगम'
भाटापारा, छत्तीसगढ़
No comments:
Post a Comment