धान की पौधों पर,
गेहूँ की बालियों पर,
अमराई पर,
तीज-त्योहारों पर,
नदी के घाटों पर,
जंगल पर, पहाड़ पर,
बाज़ार की आवाज़ों में,
गली-गली हर गाँव में,
घर के आँगन में—
तू-तू, मैं-मैं, खींचा-खींची में,
माँ के प्यार में,
पिता की फटकार में,
दादी के दुलार में,
जहाँ बोलियाँ स्वतः फूटती हैं।
यहाँ तक नहीं,
खेत जोतते किसानों का,
फसल काटती महिलाओं का,
यह गीत है, संगीत है।
ये किसी विश्वविद्यालय की देन नहीं,
वे मनुष्यों की साँसों से उगती हैं।
जहाँ दो लोग मिलते हैं,
वहाँ शब्द मिलते हैं।
जहाँ दो लोग, चार लोग बसते हैं,
वहाँ स्वतः बोलियाँ जन्म लेती हैं।
और बोलियों के साथ स्वतः व्याकरण जन्म लेता है।
कभी पहाड़ उन्हें मोड़ देता है,
कभी नदी उनका उच्चारण बदल देती है,
कभी दूरी उनके शब्दों को नया रूप दे देती है।
पर बोलियाँ सगी बहनों की तरह
मेल-मिलाप कर ही लेती हैं।
और फिर एक दिन,
कोई सत्ता कहती है—
“ये बोलियाँ अस्पृश्य हैं, इन्हें बदल डालो।”
और बोलियाँ, बेचारी, राजसत्ता के आगे
नतमस्तक हो जाती हैं।
और फिर किसी एक बोली के साथ
होता है व्यभिचार।
उसे विवश किया जाता है
सत्ता के साथ तालमेल के लिए।
वह बेचारी अबला क्या करे,
वह न चाहते हुए भी
समर्पित हो जाती है जबर्दस्ती।
इसीलिए मैं कहता हूँ,
बोलियों से जो भी भाषा
जीवंत होने का दावा करती है,
असल में वह भाषा कृत्रिम होती है।
और हर भाषा कृत्रिम होती है
इस लिए कृत्रिम होती है
क्यों की वह
राजनीति की कोख से जन्मी होती है।
और उसे जन्माने के लिए
राजसत्ता के कथित भाषाविद
मानकीकरण की मेज़ पर बैठकर
उसके नियम लिखते हैं।
कभी लिपि तय होती है,
कभी व्याकरण गढ़ा जाता है,
कभी शब्दों को कतार में खड़ा किया जाता है,
कभी उनके अर्थ बदले जाते हैं,
कभी अक्षरों को मरोड़ा-तोड़ा जाता है,
अक्षरों को नचाया जाता है—
जैसे मदारी बंदर नचाता है।
और बोली, न चाहते हुए भी,
भाषा में बदलने के लिए विवश हो जाती है।
पर आम जनमानस के द्वारा
भाषा स्वीकार्य हो ही नहीं पाती।
इसलिए भाषा आज भी
बोलियों में ही बोली जाती है—
शिवाय भाषाविद के...
हेमंत कुमार "अगम"
भाटापारा, छत्तीसगढ़
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