Friday, 8 May 2026

प्रेम

वो मुझे
इस तरह समझती है
जैसे मैं
एक मरीज हूँ,
और प्रेम
मेरी दवा।
और उसे मैं
इस तरह समझता हूं
जैसे
लहराती नदी के बीच
एक शीतल धारा
हम दोनों का
संवेदनात्मक बहाव
लगभग एक है,
बिल्कुल नदी की तरह
बस वो बहती है
और मैं नदी के बीच में
लुढ़कता हुआ 
पत्थर सा उसके संग सरकता जाता हूं
पर यह सतत नहीं होता
गर्मियां भी आतीं हैं
और हम दोनों
छुट भी जाते हैं
किसी
विरोधाभास की तरह
फिर मिलना होता है
किसी दिन
मन के बरसात में-
जब हम दोनों प्रेम में
तर होते हैं
और
इस तरलता के बीच 
हम दोनों
उस अथाह शांति 
के निमग्न हो जाते हैं...
पर कभी जब
उसका एक आँसू
मेरे आसमानी रंग 
को तोड़ता है
वह
मेरा दबाव बढ़ा देता है,
और मेरा
एक आँसू
उसका संतुलन बिगाड़ देता है।
वो पास होती है
तो धड़कन सँभलती है,
वो रोती है
तो मैं बिखर जाता हूँ।
अजीब असर है-
एक दूसरे के लिए
प्रेम का।
हम दोनों
प्रेम के भूखे भी हैं
और संतृप्त भी,
पर कभी लगता है-
हम पूरी तरह
तृप्त भी नहीं,
और पूरी तरह
असंतृप्त भी नहीं।
शायद इसी द्वंद्व में
रेत भी पानी- पानी हो जाता है-
जहाँ
मैं भी पूरा नहीं रहता,
और वो भी...
तभी याद आता है
कबीर का वह दोहा-
प्रेम गली अति सांकरी,
जा में दो न समाय....


हेमंत कुमार "अगम"
भाटापारा छत्तीसगढ़ 

Friday, 1 May 2026

लड़की


लड़की




एक लड़की
घर की लाडली
घर में हर जगह
उसका ही चूं-चूं-चूं
फिर पंख अचानक
घर में
लड़की के
बढ़े हुए दिखाई देने लगते हैं
और क्या
फिर शादी
और
अपने ही आँगन से
वह दूर हो जाती है
और उसे सिखा दिया गया होता है—
नया घर
नए लोग
नई ज़िम्मेदारियाँ
या कहें
नए रिश्ते
फिर भी वह चिड़िया
अपने मम्मी-पापा के आँगन में ही
उड़ना चाहती है
पर समय
बहुत कठोर होता है
नई ज़िम्मेदारियाँ
प्रेम के ठहराव को
असंतुलित कर देती हैं
फिर
धीरे-धीरे
मम्मी-पापा
यादों में बसने लगते हैं
समय चलता है
उम्र बढ़ती है
और
लड़की की दुनिया
पति
और बच्चों के
संतुलन पर केंद्रित हो जाती है
पर लड़की की
एक दुनिया
हमेशा
फ्रिज के कोने में रखी
आइसक्रीम की तरह होती है
जहाँ
उसके मम्मी-पापा रहते हैं
फिर
एक दिन
पापा चले जाते हैं
जैसे
पीछे खड़ा पहाड़
अचानक गायब हो जाए
लड़की
संभलती है
बचपन से उसने
यही तो सीखा है
पर सच कहूँ
वह
अधूरी हो जाती है
और
कुछ समय बाद
मम्मी भी चली जाती हैं
यहीं से
मायका
पूरा छूट जाता है
घर वही
पर
कोई अपना नहीं
दरवाज़े वही
पर
कोई इंतज़ार नहीं
लड़की का मायका
मम्मी-पापा के साथ ही
साँस लेता है
उनके बाद
वह मायका नही
सिर्फ एक जगह रह जाता है



हेमंत कुमार"अगम"
भाटापारा छत्तीसगढ़ 

पुरुष वेश्या

पुरुष वेश्या



स्त्री को
हमेशा देह में पढ़ा गया,
और पुरुष को
चरित्र में।
यहीं से
भ्रम शुरू होता है,
क्योंकि
देह दिखाई देती है
और मन
अपने को छुपा लेता है।
पुरुष
देह से नहीं,
अपनी इच्छाओं से
वेश्या-वृत्ति करता है।
वह कहीं जाता नहीं,
पर हर जगह उपस्थित रहता है-
अपनी कल्पनाओं में,
अपनी विचारधाराओं में।
उसकी चेष्टा
व्यवहार में नहीं,
व्यवहार को दृष्टांत में
बदलने की होती है,
जो
नैतिकता का सबसे शांत
प्रतिरूप है।
समाज
उसे स्थायित्व देता है,
नाम देता है,
पुरस्कार देता है,
और वह
इन सबके भीतर
बिना भय के
एक अदृश्य दृष्टिकोण जीता है,
जो व्यभिचार से परिपक्व होता है।
वह
एक से दूसरी,
दूसरी से तीसरी,
और न जाने
कितनी
यात्राएँ करता है
बिना गए हुए।
वह भूत की तरह
किसी कल्पना-रेखा में
बेखौफ़
चला जाता है।
यहीं
व्यभिचार की
सूक्ष्मता परिलक्षित होती है,
जहाँ शरीर कम,
चेतना अधिक
विचलित होती है।
और यह आचरण
हर पुरुष करता है,
वह अपनी स्वीकृतियों के भीतर
अपनी ही अस्वीकृतियों
के समानांतर चलता है।
इसीलिए वेश्यावृत्ति
केवल देह का सौदा नहीं,
इच्छा का भी है।
तो पुरुष
उसके बाहर नहीं है,
बस
उसकी मुद्रा
अदृश्य है,
और उसका बाज़ार
मन के भीतर भी
और बाहर भी लगता है।
अतः पुरुष को
भी वेश्या कहने में
कैसी शर्म....



हेमंत कुमार "अगम"
भाटापारा, छत्तीसगढ़