वो मुझे
इस तरह समझती है
जैसे मैं
एक मरीज हूँ,
और प्रेम
मेरी दवा।
और उसे मैं
इस तरह समझता हूं
जैसे
लहराती नदी के बीच
एक शीतल धारा
हम दोनों का
संवेदनात्मक बहाव
लगभग एक है,
बिल्कुल नदी की तरह
बस वो बहती है
और मैं नदी के बीच में
लुढ़कता हुआ
पत्थर सा उसके संग सरकता जाता हूं
पर यह सतत नहीं होता
गर्मियां भी आतीं हैं
और हम दोनों
छुट भी जाते हैं
किसी
विरोधाभास की तरह
फिर मिलना होता है
किसी दिन
मन के बरसात में-
जब हम दोनों प्रेम में
तर होते हैं
और
इस तरलता के बीच
हम दोनों
उस अथाह शांति
के निमग्न हो जाते हैं...
पर कभी जब
उसका एक आँसू
मेरे आसमानी रंग
को तोड़ता है
वह
मेरा दबाव बढ़ा देता है,
और मेरा
एक आँसू
उसका संतुलन बिगाड़ देता है।
वो पास होती है
तो धड़कन सँभलती है,
वो रोती है
तो मैं बिखर जाता हूँ।
अजीब असर है-
एक दूसरे के लिए
प्रेम का।
हम दोनों
प्रेम के भूखे भी हैं
और संतृप्त भी,
पर कभी लगता है-
हम पूरी तरह
तृप्त भी नहीं,
और पूरी तरह
असंतृप्त भी नहीं।
शायद इसी द्वंद्व में
रेत भी पानी- पानी हो जाता है-
जहाँ
मैं भी पूरा नहीं रहता,
और वो भी...
तभी याद आता है
कबीर का वह दोहा-
प्रेम गली अति सांकरी,
जा में दो न समाय....
हेमंत कुमार "अगम"
भाटापारा छत्तीसगढ़
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