Tuesday, 3 December 2019
दोहे -पिज्जा
Saturday, 23 November 2019
जलाना पड़ता है खुद को जानता हूँ
मेरे बारे में मैं जब भी सोचता हूँ
मैं अपना ही पता खुद से पूछता हूँ
किसी पे मैं अगर ग़ुस्सा भी करूँ तो
यक़ीनन अपना ही बिस्तर नोचता हूँ
मेरे पीछे अगर आओ तो पता हो
कि मंजिल मैं नही टेढ़ा रास्ता हूँ
बड़े लोगों के होंगे नख़रे हजारों
ग़रीबी मैं बिछाता हूँ ओढ़ता हूँ
उजाले यूँ नही घर आते हैं साहब
जलाना पड़ता है खुद को जानता हूँ
ग़ज़ल
हेमंत कुमार मानिकपुरी
भाटापारा छत्तीसगढ़
Wednesday, 20 November 2019
मैं मर चुका हूँ
दर्द दिल का हरा हो गया है
(2122, 122,122)
दर्द दिल का हरा हो गया है
जब से वो बे-वफा हो गया है
चूमा था उस ने जिस-जिस जगह को
उस जगह का भला हो गया है
खुद ही बोए थे हमने जो काँटे
दर्द बनकर खड़ा हो गया है
नफ़रतें जब से हावी हुईं तो
प्यार जैसे हवा हो गया है
अब तो मयख़ाना हर आदमी का
जैसे स्थाई पता हो गया है
लोभ हावी हुआ तो हुआ ये
ज़्यादा भी अब ज़रा हो गया है
ग़ज़ल
हेमंत कुमार मानिकपुरी
भाटापारा छत्तीसगढ़
Saturday, 16 November 2019
मेरा दर्द जब हम-नवा हो गया है
Sunday, 10 November 2019
हैं मकाँ कितने घर नहीं मिलता
कोई मुझको सहर नही मिलता
हैं मकाँ कितने घर नही मिलता
याद मुझको न आए तू दिलबर
ऐसा इक भी पहर नही मिलता
चाहता तो हूँ बैठना दो पल
राह में पर शजर नही मिलता
नजरों में खोंट हों अगर तो फिर
लाख ढूँढो गुहर नही मिलता
उनके नज़रों के सामने हैं पर
आजकल क्यूँ नज़र नही मिलता
ग़ज़ल
हेमंतकुमार मानिकपुरी
भाटापारा छत्तीसगढ़
Saturday, 9 November 2019
इश्क है तो आ यहां
या कहीं इस मुस्कुराने में अना है
या मुहब्बत में वो भी सचमुच फना है
आज मौसम ने जो बदला अपना पाला
हर तरफ बस आसना है आसना है
आसमाँ पे उड़ने वाले लौट के आ
तेरी अम्मी की यही बस कामना है
उम्र भर चलता रहा जिससे मैं बच के
हाय! रे मेरा उसी से सामना है
सिर्फ काँटें हैं यहाँ ये जान ले तू
इश्क है तो आ यहाँ वरना मना है
ग़ज़ल
हेमंत कुमार मानिकपुरी