Wednesday, 20 November 2019

दर्द दिल का हरा हो गया है

(2122, 122,122)

दर्द   दिल  का   हरा   हो   गया  है

जब  से   वो   बे-वफा  हो  गया  है

चूमा था उस ने जिस-जिस जगह को

उस  जगह  का  भला  हो  गया  है

खुद  ही  बोए  थे  हमने  जो  काँटे

दर्द   बनकर   खड़ा  हो   गया   है

नफ़रतें  जब   से   हावी   हुईं   तो

प्यार   जैसे    हवा   हो    गया   है

अब  तो  मयख़ाना हर आदमी का

जैसे    स्थाई   पता   हो   गया   है

लोभ   हावी   हुआ   तो   हुआ   ये

ज़्यादा  भी  अब  ज़रा  हो  गया  है

ग़ज़ल

हेमंत कुमार मानिकपुरी

भाटापारा छत्तीसगढ़

Saturday, 16 November 2019

मेरा दर्द जब हम-नवा हो गया है

122/122/122/122

था जो अपना वो बे-वफ़ा हो गया है

ज़ख्म तब से हर-सू  हरा  हो गया है


अभी चाँद को मैं बुला लेता छत पर

मगर  वो  किसी गैर  का  हो गया है


मुझे  दोस्तों  की  जरूरत  नही अब

मेरा  दर्द  जब  हम-नवा हो  गया है


जो मुतमइन था पहले  मेरे असर से

किसी और का बा- खुदा हो गया है


जो आँसूओं से पिघलते ही कहाँ थे

सुना  है  वो  पत्थर खुदा हो गया है



ग़ज़ल
हेमंत कुमार मानिकपुरी
भाटापारा छत्तीसगढ़

Sunday, 10 November 2019

हैं मकाँ कितने घर नहीं मिलता

2122 1212 22

कोई मुझको सहर नही मिलता

हैं मकाँ कितने घर नही मिलता

याद मुझको न आए तू दिलबर

ऐसा इक भी पहर नही मिलता

चाहता   तो  हूँ  बैठना  दो  पल

राह में  पर शजर नही   मिलता

नजरों में खोंट हों अगर तो फिर

लाख  ढूँढो  गुहर  नही  मिलता

उनके  नज़रों  के  सामने  हैं पर

आजकल क्यूँ नज़र नही मिलता

ग़ज़ल

हेमंतकुमार मानिकपुरी

भाटापारा छत्तीसगढ़



Saturday, 9 November 2019

इश्क है तो आ यहां

2122/2122/2122

या   कहीं   इस  मुस्कुराने   में  अना है

या  मुहब्बत  में वो भी सचमुच फना है

आज मौसम ने जो बदला अपना पाला

हर  तरफ  बस  आसना  है आसना है

आसमाँ   पे   उड़ने  वाले  लौट  के आ

तेरी  अम्मी  की  यही  बस  कामना  है

उम्र भर  चलता  रहा जिससे मैं बच के

हाय!   रे   मेरा   उसी   से   सामना  है

सिर्फ  काँटें  हैं  यहाँ  ये  जान   ले  तू

इश्क  है  तो  आ  यहाँ  वरना  मना  है

ग़ज़ल
हेमंत कुमार मानिकपुरी








Wednesday, 30 October 2019

Gazal


२१२/२१२/२१२/२

आज तो बच गया बरकतों से,

बाज आ अपनी इन हरकतों से।

उठ खड़ा हो चला कर खुदी से,

घाव भरता नही मरहमों से।

सच ये दुनिया है मत जा इधर तू,

ये भरी है बहुत गमजदों से।

इश्क कर ये बहुत काम का है,

तोड़ नाता सभी नफरतों से।

लेटकर नाप ले इस जमी को,

घर रहेगा यही मुद्दतों से।

तेरा आना है जाना है जिस घर,

उस जगह को बचा जलजलों से।

मौत का क्या है आयेगी इक दिन,

कर कभी दोस्ती दुश्मनों से।

ग़ज़ल
हेमंत कुमार मानिकपुरी
भाटापारा
छत्तीसगढ़

Friday, 18 October 2019

ग़ज़ल

221   2121     1221      212

मफ़ऊलु फाइलातु मफ़ाईलु फाइलुन 

(बह्र: मुजारे मुसम्मन् अखरब मक्फूफ महजूफ )

खा़के  शिफ़ा  से चैन  न आएँ तो क्या करें

ये ज़िन्दगी भी जख़्म दे जाएँ तो  क्या करें

जानें  गईं  थी  दोनों ही सम़्तों  में सच हैं ये

उस  नाशिरात को  न  भुलाएँ  तो  क्या करें

मुमकिन  नहीं  हैं पर्दे के उस पार जाना अब

हैं   उस  तरफ़  हजारों  दुवाएँ  तो  क्या  करें

इन  पत्थरों  के  शह्र  में  हैं  पत्थरों  के  घर

जब  पहुँचती  नहीं  हैं  सदाएँ  तो  क्या करें

अब  उन  गुलों  में  कोई  नही  हैं मेरा निशाँ

कमसिन  हुईं  हैं  उनकी अदाएँ तो क्या करें

हेमंत कुमार मानिकपुरी

भाटापारा छत्तीसगढ़

Monday, 7 October 2019

श्रृंगार दोहे

आओ  बैठो  पास  में  , रख  हाथों  पे  हाथ।
जानें कब मौका मिले, है कुछ पल का साथ।।

कुछ तुम भी अपनी कहो, मैं भी कह लूँ बात।
मौसम  बहुत  हसीन  है , तारों  की है  रात।।

झींगुर   हमको   देख   के  , छेड़े  हैं  संगीत।
हम  भी  सुर में सुर मिला, आओ  गाएँ गीत।।

कुछ पल को हम छोंड़ दें, दुनिया की हर रीत।
नयनों  से  बातें  करें  ,  अधरों  से  हम  प्रीत।।

जैसे  चमके  बीजुरी , कड़काओ  हिय तार।
सावन  के घन-मेघ सा, तुम बरसाओ प्यार।।

चाँदी  जैसै  देह  को  , तारों   की  सौगात।
मैं  दिन  की  अवहेलना , तुम चंदा की रात।।

नयनों  को  विश्राम  दें, बाँहों   की  है आस।
गुच्छ पुष्प सा बन गले ,लिपटें आओ पास।।

मिलना अब मुमकिन नही,मन में हैं अवसाद।
सच कहता  हूँ तुम प्रिये, आओगे  नित  याद।।

हेमंत कुमार मानिकपुरी

भाटापारा  छत्तीसगढ़

7000953817