Sunday, 6 October 2019

ग़ज़ल(उनके तहख़ाने पे तहख़ाने लगे हैं)

2122/2122/2122

जाने क्या अब लोग समझाने लगे हैं

सब  की अपने ज़द  में पैमाने लगे हैं

प्यार  तो कोई नही  करता  है साहब

ये   हक़ीक़त   सामनें  आने  लगे  हैं

शाइरी   बीमार   है   शायर   मजे  में

क्या  ग़ज़लगोई  को  बहलाने लगे हैं

भूखें हैं इतनी हवस की  क्या कहूँ मैं

ये  तो  नाते-रिस्ते  भी  खाने  लगे हैं

शह्र में अब तो सहर जैसा नही कुछ

लोग फिर अब गाँव तक आने लगे हैं

क्या हुई जो रोशनी सूरज की कमतर

जुगनुएँ  भी  पंख  फैलाने  लगे  हैं

वे  बहुत  चालाक  हैं ये जान लो तुम

उनके   तहख़ाने  पे  तहख़ाने  लगे  हैं

ग़ज़ल

हेमंत कुमार मानिकपुरी

भाटापारा  छत्तीसगढ़






Wednesday, 2 October 2019

पेड़ काटने से हुआ,धरती का नुकसान(दोहा)

दोहा
पेड़   काटने   से   हुआ , धरती का नुकसान।
हवा न अब ताजी बहे, वन-उपवन खलिहान।।

धुँआ-धुँआ  क्यों  आसमाँ , सोचें सारे लोग।
वायु  प्रदूषण  से हुआ, ईको  तंत्र  को  रोग।।

जहरीली   गैसें   उड़ें  ,  बनके   जैसे  काल।
मानव   पक्षी  जानवर  ,  होत  सभी  बेहाल।।

पानी  भी  गिरता  सदा, खंड  रूप  में  जान।
एक  ओर जल थल भरे, कहीं  रहे  अन्जान।।

कभी कभी इतना गिरे, 'थल' जल होय समान।
डूबे  ये   नाले    नदी  ,  जाय   हजारों  जान।।

कटे  पेड़  जब  नित्य  ही , कौन  लगावे  पार।
काटें   जब   भी  पेड़  जो , वृक्ष  उगावें  चार।।

जल  प्रदूषण  से  हुआ , बुरा  धरा का हाल।
कीट  पतंगें  साँप  भी , मरते हैं  हर  साल।।

शिल्प-सदन   से  बह  रहा  ,  गंदा  गंदा  नीर।
नाले  नदियों  की  हुई  , दशा  बहुत गंभीर।।

मछली  मेंढक  या  मगर, या कछुए की जात।
त्राहि त्राहि  सब कर रहे, समझो भी ये बात।।

पादप  भी  हलकान  हैं ,  झाड़  वृक्ष  या  दूब।
एक  तरफ  गंदी  हवा , अरु  गंदा जल खूब।।

ध्वनि से  भी अति हो रहा ,वायु प्रदूषण आज।
डी  जे  की आवाज सुन, हृदय होय  आघात।।

शोर   शराबे    में  कहाँ  ,  मन   होवे  हैं शांत।
पागल  पन  सा  होत  है , यही  रोग  सभ्रांत।।

बात  युवा  की  और  है  , उनको  भाये  शोर।
बूढ़ा  ,  रोगी   को   लगे ,  कर्कशता  पुरजोर।।

कहीं  प्रदूषण  जब रहे, उसका  कर  दें  नाश।
हरी   भरी   धरती   रहे , साफ  रहे  आकाश।।

बचा    सको    पर्यावरण  , ऐसा   हो   संज्ञान।
सुखी  रहें  सब  जीव  भी, चलो  बढ़ाएँ ज्ञान।।

दोहे

हेमंत कुमार "अगम"
भाटापारा छत्तीसगढ़

Thursday, 26 September 2019

दोहा

हर पल जीवन में रहे,प्रेम भरा उल्लास।

बगिया जैसे फूल की,महके चारो मास।।

मन मे दीपक तो जले,चाहे बाहर रात।

अँधियारा गर मन रहे,तम हो कैसे मात।।

सोंचो समझो जान लो,जीवन के सब रंग।

बारी बारी आत है,हँसी-खुशी ,दुख जंग।।

खिड़की खोलो देंह की,मन दरवाजा तोल।

सोंच समझ खर्चा करो,यह जीवन अनमोल।।

नहिँ भुजंग लाठी मरे,और न मरे घमंड।

प्रेम रतन लाठी भली,काम करे यव-मंड।।

दोहे

हेमंत कुमार मानिकपुरी

भाटापारा छत्तीसगढ़

Monday, 16 September 2019

ज़िक्र मेरा आएगा उनके हर फ़साने में

212    1222     212       1222

ज़िन्दगी जलाएँ  है ज़िन्दगी को पाने में

गम को छोड़ आये हैं हम शराबख़ाने में

आजकल  वो हमसे ही  दूर दूर  रहते हैं

ज़िन्दगी  खपा दी हमने  जिन्हे बनाने में

यार कब की ये दुनिया जान ले गई होती

मर्द हैं तो ज़िन्दा हैं अब तलक जमाने में

राख ये कहीं फिर से आग तो न बन जाये

लोग कुछ लगे हैं फिर  राख को जलाने में

आज हमसे रूठे हैं तो हैं देखना इक दिन

ज़िक्र  मेरा  आएगा उनके  हर फ़साने  में

ग़ज़ल

हेमंत कुमार "अगम"

भाटापारा

Friday, 28 June 2019

तू मानता क्यूँ नही ....ग़ज़ल

212/212/212/212

दरिया की प्यास भी देखता क्यूँ नही

जब तू बादल है तो बरसता क्यूँ नही

तुझको धन से नवाज़ा खुदा ने बहुत

पर  ग़रीबों  के  वास्ते  दया क्यूँ नही

लड़ता है  अपनो  से रोज  बेकार ही

बे - वजह  जंग को  रोकता  क्यूँ  नही

चलना है तुमको जिस रास्ते पे सदा

काँटे  उन  राहों  का  काटता क्यूँ नही

प्यार  का फलसफा  रोज  कह देता है

प्यार  को यार फिर बाँटता  क्यूँ नही

क्या तू कहता है क्या तू नही कहता है

गर  नही  जानता , जानता क्यूँ  नही

ग़ज़ल

हेमंत कुमार मानिकपुरी

भाटापारा छत्तीसगढ़

Friday, 7 June 2019

धूप छाँव खोजता है

दो पहरी की गर्मी से
थककर झुलस कर
धूप घर के आँगन में
परदे की छाँव में बैठ गया
पसीने से तर्र
न साफा न पगड़ी
गर्म हवाओं का चक्रवात
और कहीं नही ठहरने की जगह
बेचारा करे भी तो क्या
न जंगल है न झाड़ियाँ
तालाब नदियाँ झरने
सब जगह देख लिया
कहीं भी पानी का अता पता नही
होंठ सूख चुके है
तन आग का गोला हो रहा था
जैसे अग्नि-पथ से गुजर रहा हो
सोच रहा था शाम तक मुझे
सूर्य में विलीन हो जाना है
और फिर रात भर तपना हैं
हर गर्मियों में मुझे ठंडक मिल जाती थी
अब ये धरती कैसी हो गई है
पहले तो एसा नही थी
कि मुझे छाँव भी खोजना पड़ा हो  ???

रचना
हेमंत कुमार "अगम"
भाटापारा
रचना श्रेणी-अतुकांत

Thursday, 6 June 2019

दोहा

दोहा

सादा कुरथा देख के,समझव झन गुनवान।
मन मा कतका दाग हे,देवव थोरिक ध्यान।।

आनी बानी लोभ दय,करय अपन गुनगान।
भाखा मा हे गुड़ मिले,मिठहा-मिठहा जान।।

गली खोर चारो मुड़ा,रात रात भर जाय।
जेकर लालच जेन बर,वइसन भात खवाय।।

बने असन मुखिया चुनव ,फँसव नही तुम जाल।
लालच ला छोंड़व गड़ी,रखव देश के ख्याल।।

हे  नेता - नेता  मा फरक,जइसे  बगुला हंस।
राम किसन ला छाँट लव,छोंड़व रावन कंस।।

सोंच समझ तुम वोट दव,कँहव बात मैं सार।
ढेंकी   कूटय  धान  जब , भूँसा  देय  निमार।।

हेमंत कुमार मानिकपुरी

भाटापारा