Sunday, 3 September 2017

ग़ज़ल

फा़इलुन ,फा़इलुन,फ़ाइलुन,फाइलुन

हर गली शाम तक आज दुबकी दिखी

धूप  भी  छाँव  के  संग  बैठी  दिखी

ये अमा अब उजालों में खोती दिखी

झोफड़ी में कोई रौशनी सी दिखी

जाने क्या  कह  दिया है  किसी  ने  उसे

उनकी आँखो में जो आज तल्ख़ी दिखी

जिन्दगी फिर से थमने लगी थी यहाँ

चींटी फिर एक दीवार चढ़ती दिखी

मुद्दतों  बाद ये शह्र बेखौफ़ है

राह चलती हुई आज लड़की दिखी

अमा-अँधेरा

ग़ज़ल

हेमंत कुमार मानिकपुरी

भाटापारा

छत्तीसगढ़

Saturday, 2 September 2017

दोहा


हिन्दी से ज्यादा अभी,है अंग्रेजी दौर।

अंग्रेजी जो बोलता,उसके सर पर मौर।।

अंग्रेजी माध्यम बना,है बहुतेरे स्कूल।

ए,बी,सी,डी पढ़ रहे,हिन्दी भाषा भूल।।

याद नही है अब हमें,हिन्दी वाले अंक।

ये कैसा दुर्भाग्य है,लगा सोच पर जंक।।

हर घर में बनता दिखे, पास्ता नूडल आज।

स्वाद भूल देशी रहे,फास्ट फूड का राज।।

बाप बाप अब ना रहा,डैड नया है नाम।

मॉम बनी  माता  ,सभी, देखो  मेरे  राम।।

हाय बाय अब चल रहा,नमस्कार ना होत।

ब्रो,सिस् कहने लगे , सब  अंग्रेजी  होत।।

सर से लेकर पाँव तक,गाँव शहर के लोग।

संस्कृति पश्चिम का करे,बिन सोचे उपभोग।।

चले गए गोरे सभी,हिन्द हुआ स्वतंत्र।

फिर उनकी संस्कृति हमें,बना गई परतंत्र।।

दोहा

हेमंत कुमार मानिकपुरी

भाटापारा छत्तीसगढ़

Tuesday, 29 August 2017

दोहा

भादो महिना में हुआ,बारिश का संयोग।

पानी गिरते देखकर,खुश  हैं सारे लोग।।

छाई है फिर से  घटा,कई  दिनों  के बाद।

बादल गरजा है बहुत, आया सावन याद।।

सरर-सरर चलती रही,हवा आज दिन-रात।

पानी  बरसा  जोर  से, आई  रे  बरसात।।

सूखे खेतों का मिटा,मुश्किल से जी प्यास।

जगी किसानों में नई,उम्मीदों की आस।।

चहल पहल है खार में,तेज हुए सब काज।

हल खेतों में चल पड़े,अर्र-तता आवाज।।

कोई रोपाई  करे ,कोई  ब्यासे  खेत।

खाद डाल कोई रहा,कोई कोड़ा देत।।

बाँध कछोरा हैं रखीं,सब महिला मजदूर।

काम खेत में कर रहीं, आँखों मै  है नूर।।

मेंढक खुश हैं देखकर,मस्त मस्त बरसात।

टरटों टरटों गा  रहे, कंठ  खोलकर  रात।।

झींगुर झीं-झीं कर रहा,जुगनू जलता आप।

रात ख़ास है सुरमई, उल्लू करे अलाप।।

खार-वह जगह जहाँ खेत होते हैं

अर्र-तता --बैलों को मोड़ने हेतु आवाज

कछोरा-साड़ी को मोड़कर घुटनो तक पहनने का

खा़स तरीका

दोहा

हेमंत कुमार मानिकपुरी

भाटापारा छत्तीसगढ़

Sunday, 27 August 2017

दोहा

परत परत खुल जा रहा,बाबाओं का राज।

पूज रहे जिसको सभी,निकले चीड़ी बाज।।

हीरो को भी दे रहे,पल भर में ये मात।

बाहर योगी सा बने,अन्दर मैली घात।।

धरम, करम ,पैसा, सखा,पावर भी हैं साथ।

घी में डूबे हैं सभी,दोनो इनके हाथ।।

मठ इनका होता हरम,करम करे ये भोग।

अबला नारी का करे,ये वहसी संभोग।।

भोगी आशा राम है,भोगी राम रहीम।

रामपाल भी कम नही,ये सब मीठे नीम।।

अंध भक्त को चाहिए,सब कुछ को ले तोल।

फिर गुरु की सेवा करे,समझ जाय जब मोल।।

हेमंत कुमार मानिकपुरी

भाटापारा

छत्तीसगढ़

Thursday, 10 August 2017

दोहा

शुक्ल पाख नवमी लगन,सावन महिना आय।
हरियर हरियर भोजली,बहिनी मन सिरजाय।।

धरती मा पानी गिरय,होवय बढ़िया धान।
इही आस ले के सबो,करय भोजली गान।।

धान गहूँ कोदो चना,चरिहा भर लहराय।
सब बहिनी सेवा करय,कतका मन ला भाय।।

दशमी के दिन भोजली,पीका फूटे तोर,
जब आए एकादशी,पाना निकले कोर।।

रूप दुवासे पींवरा,जइसे चमकय सोन।।
लहर लहर लहरा करे,देखव तो सिरतोन।

थाल फूल दीया सजे,पूजा के बड़ रीत।
गावय सेवा सब जने,देबी गंगा गीत।।

तेरस के दिन भोजली,रूप अनोखा पाय।
नान्हेपन ला कर बिदा,तरुनाई मा जाय।।

तिथि चउदस के दिन करय,पूजा पाहुन सार।
जम्मों भक्तन हे कहय,मात करव उपकार।।

पुन्नी के दिन माँ चलय,अपन सार निज धाम।
बहिनी मन बोहे रहय,आँसू अँचरा थाम।।

रचना
हेमंतकुमार मानिकपुरी
भाटापारा छत्तीसगढ़

Tuesday, 25 July 2017

दोहा


दोहा

काँसा के थारी रहय ,अउ हँड़िया के भात,
मार पालथी रँधनही,खावन ताते तात।

बटकी काँसा के रहय,पेंदी गहिरा गोल।
बने खात बासी बनय,स्वाद आय अनमोल।।

छर्रा छर्रा अउ लरम, गजब पैनहा भात।
परसँग अब्बड़ तो करय,ददा बबा मन खात।।

रहय कुँडे़रा बड़ जनिक,पेज पसावन जान।
हंडा ,हँउला मा धरय,पानी कस के तान।।

लोटा काँसा घर सबो, पीतल संग गिलास।
रहय नानकुन चरु घलो,गोड़ धोय बर खास।।

माटी के हथ फोड़वा,रखय आँच के ध्यान।
बिना तेल चीला बनय,बड़ पुरखा के ग्यान।।

हेमंत कुमार मानिकपुरी
भाटापारा
छत्तीसगढ़

Friday, 7 July 2017

दोहा

दोहा (13/11)
श्रृंगार रस

सोलह के दहलीज पर,यह कैसी झंकार।
नई नई दुनिया दिखे,नया नया श्रृंगार।।

होठों पर मादक हँसी,नयना झलके प्यार।
बातों से  मधुरस  झरे, अलबेली  है  नार।।

झुमका मानो कह रहे,कानो में रस घोल।
यौवन तुझपे आ गया,गोरी कुछ तो बोल।।

गला सुराही की तरह,काले लंबे बाल।
माथे पर चंदा लगे,बिन्दी मखमल लाल।।

दर्पण कंघी से हुआ,अनायास ही प्यार।
सजने-धजने है लगी,दिन मे सोलह बार।।

स्वप्न  सुनहरे  आ  गए, लेकर  के  बारात।
पिया-पिया मन कह उठा,नही चैन दिन-रात।।

नाच उठी पायल छनक,कँगना करती शोर।
प्रियतम मुझको ले चलो,प्रेम डगर की ओर।।

हेमंत कुमार मानिकपुरी
भाटापारा
छत्तीसगढ़