मैं अपने घर लौटने से पहले
घर लौट आता हूँ।
मेरा शरीर अभी भी
शहर की सड़कों पर होता है,
पर मेरा मन
घर की दालान में
बैठ चुका होता है।
अचानक याद आता है—
छोटी और गुड़िया
इस समय छत पर टहल रहे होंगे।
मन
सीढ़ियाँ चढ़ने लगता है
तेज़ क़दमों से,
छत पर पहुँचकर देखता है—
वे वहाँ नहीं हैं।
फिर नीचे उतरकर
उनके कमरों में झाँकता है—
पर यह क्या?
कमरे भी खाली हैं।
तभी स्मरण होता है—
अरे, वे दोनों तो हॉस्टल में हैं।
हल्की-सी खुशी,
हल्की-सी हताशा लिए
मन
कमरे से निकल आता है।
इसी बीच
कुक्कू के कमरे से सिंथेसाइज़र का मधुर स्वर
सुनाई देता है
और मन शांत हो जाता है।
धीरे-धीरे मैं माँ के कमरे में जाता हूँ।
कमरे में जाते ही
मैं माँ के पास बैठ जाता हूँ।
माँ के पास बैठते ही
मन तंद्रा की अवस्था में
जाने लगता है।
तभी
रसोई से
बर्तनों की धड़ाम सुनाई देती है,
और मन
हवा से भी तेज़ क़दमों से
रसोई की ओर दौड़ने लगता है।
वहाँ देखता हूँ—पत्नी है,
थकी-हारी, बेचारी!
बाल अब भी उलझे हुए हैं,
चेहरे पर पसीने की थाप,
हल्दी और फोरन की छींटें,
और बीच-बीच में मुस्कुराती हुई
कड़ाही पर
मेरी पसंद का
व्यंजन बना रही है।
उसी बीच-बीच में उसके हाथ
बर्तनों की ओर भी बढ़ते हैं,
उन्हें माँजने के लिए…
बेचारी कितनी थक जाती होगी,
पर जब मैं घर आता हूँ,
पत्नी
मेरी आँखों में झाँककर
शरीर की थकान पढ़ लेती है।
वह कुछ पूछती नहीं—
बस इतना भर कहती है,
“हाथ-मुँह धो लीजिए,
मैं खाना लगाती हूँ।”
इतना सुनते ही
मेरे दिन भर की थकान
प्यार और ऊर्जा में बदल जाती है,
घर ,घर नहीं रहता
स्वर्ग हो जाता है।
इसीलिए
रोज शरीर से पहले
मेरा मन घर लौट आता है…
— हेमंत कुमार "अगम"
भाटापारा, छत्तीसगढ़